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रिश्ते या रस्सी? परिवार में तुलना और स्वार्थ पर लेख

Reported By : Padmavat Media
Published : October 15, 2026 11:03 PM IST
रिश्ते या रस्सी? अपने ही घर की बात है — लेखिका : ऋतू सोढ़ी
लेखन | विचार

रिश्ते या रस्सी? अपने ही घर की बात है

       लेखिका: ऋतू सोढ़ी

बचपन से ही जिन घरों में बच्चों के बीच प्रतिस्पर्धा के बीज बोए जाते हैं और रिश्तेदार हर मौके पर तुलना करते रहते हैं, वहाँ बच्चे जटिलताओं के साथ बड़े होते हैं। एक बच्चा कक्षा में टॉप करता है, दूसरा औसत नंबर लाता है—तुरंत तुलना शुरू हो जाती है। देखो, फूफाजी का बेटा तो आईआईटी में है, तुम क्या कर रहे हो? यह एक वाक्य बच्चे के अंदर हीनता का बीज बो देता है। माँ-बाप मध्यम वर्ग के हों या उच्च समाज से जुड़े हों, फर्क नहीं पड़ता। ऐसे माहौल में सिर्फ बदले और जलन की भावना पनपती है। प्यार-मोहब्बत कोसों दूर रह जाता है।

खुदा न खास्ता कोई रिश्तेदार आर्थिक संकट में मदद माँगने आए तो जवाब मिलता है—हमारे पास खुद के खर्चे पूरे नहीं होते, तुम कहाँ से आ गए? मदद की जगह बेइज्जती मिलती है।

ये परिवार शिक्षा में अव्वल दिखते हैं, लेकिन हर बच्चा वैसा नहीं होता। सबकी अपनी अलग पहचान होती है, लेकिन परिवार उनमें प्रतिस्पर्धा भरकर नफ़रत ही पैदा करते हैं। भाई-बहन धीरे-धीरे दुश्मन बन जाते हैं। एक भाई सफल हो जाता है तो दूसरा उसे नीचा दिखाने के मौके ढूँढता रहता है। मैंने अब तक बिना स्वार्थ का कोई रिश्ता देखा ही नहीं। हर मुस्कान के पीछे कोई हिसाब छिपा होता है।

कोई रिश्तेदार मोटा हो तो तुरंत फैसला सुना दिया जाता है—इतना खाते हो, सेहत खराब कर ली। क्या उसकी कोई मेडिकल कंडीशन नहीं हो सकती? पतला हो तो सहानुभूति दिखाकर कहा जाता है—बेचारा, कुछ खाता ही नहीं। असल में कुछ किया नहीं जाता। बस नीचा दिखाने के लिए अपने बच्चों से तुलना शुरू कर दी जाती है—हमारा बेटा तो रोज जिम जाता है, तुम्हारा देखो। न किसी की आर्थिक मजबूरी से मतलब, न बीमारी या मानसिक दबाव से। यदि इतनी ही चिंता है तो उनका इलाज करवाओ। सिर्फ तंज कसने और जानबूझकर नीचा दिखाने से आपकी इज्ज़त उस बच्चे की आँखों में कम हो जाती है, यह समझना बहुत ज़रूरी है।

ऊपर से परिवार में बड़े होने का अहंकार कूट-कूट कर भरा जाता है। उम्र में बड़ा व्यक्ति गलत बात कहे तो भी छोटों को चुप रहना सिखाया जाता है। बड़े हैं, सम्मान दो—भले ही वे सम्मान के लायक न हों। छोटे होने का मतलब है कि आप कुछ कह भी नहीं सकते, अपनी बात समझा भी नहीं सकते। शादियाँ होने के बाद बहुओं में भी यही खेल शुरू हो जाता है। एक बहू अच्छे कपड़े पहन ले तो दूसरी की सास कहती है—देखो, कैसी दिखने लगी है। एक की तनख्वाह ज्यादा हो तो दूसरी को नीचा दिखाने की कोशिश होती है।

इन सब बातों से साफ हो जाता है कि परिवार अब एकता और प्यार का सहारा नहीं रह गया है। वह राजनीति का अखाड़ा बन चुका है, जहाँ हर कोई अपना पक्ष मजबूत करने में लगा रहता है।

सवाल यही है—क्या परिवार इज्जत और स्नेह से चलते हैं या सिर्फ प्रतिस्पर्धा और दिखावे से?

सच तो यह है कि जहाँ तुलना और स्वार्थ का बोलबाला हो, वहाँ रिश्ते सिर्फ नाम के रह जाते हैं। प्यार तभी बचता है जब हम एक-दूसरे की खूबियों को स्वीकार करें, कमजोरियों पर हँसने की बजाय साथ खड़े हों और बड़े-छोटे के अहंकार को दरकिनार कर दें। वरना परिवार सिर्फ एक मंच रह जाएगा, जहाँ हर कोई एक-दूसरे को हराने की कोशिश में लगा रहता है। सच्चा परिवार वही है जो तुलना नहीं, सहयोग सिखाए।

मुझे सिर्फ इतना कहना है कि जब मरकर उसी श्मशान में जाना है, जहाँ ईश्वर फर्क नहीं करता, तो इतना अहंकार लेकर चलना क्या उचित है? जो लोग मरने के बाद की दुनिया की कल्पना भी नहीं कर पाते, शुभ-शुभ बोलो, मरें मेरे दुश्मन कहने वाले यही लोग अगर अध्यात्म का रास्ता लें या ईश्वर को एक बार समझने की कोशिश करें और हर किसी से प्यार से मिलें, अपना-पराया न कर सबके बच्चों को अपना समझ लें, तो ये कष्ट ही खत्म हो जाएंगे।

आप इस धरती पर एक आत्मा हो और अपना कर्म पूरा करके चले जाओगे। यदि कॉम्पिटिशन की जगह बच्चों को बचपन से ये पाठ पढ़ाया जाए, तो हर घर में कलियुग को दोष देना बंद हो जाएगा, क्योंकि आखिरकार कलियुग आपकी आदतों से ही तो बना है।

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