स्त्री

तुम्हे तो स्वयं भगवान भी नहीं समझ सकते,
अक्सर यह कहकर व्यंग किया जाता है I
पति की एक आज्ञा पर वनवास चली जाती हूँ,
उसके निर्णय पर कोई सवाल नहीं उठाती हूँ,
मुझे समझना आसान नहीं I
अपनों की भरी सभा में दाव पर लगा दी जाती हूँ
अपमान का घूंट पीकर भी रिश्ता निभाती हूँ,
मुझे समझना आसान नहीं ।
दुनियां में आने से पहले कोख में मार दी जाती हूँ,
वंश चलाने की खातिर ममता का गला दबाती हूँ,
मुझे समझना आसान नहीं ।
घर की लक्ष्मी होकर धन के लिये जला दी जाती हूँ,
अपनी किस्मत को कोसते हुए खामोश हो जाती हूँ,
मुझे समझना आसान नहीं ।
हर पलअपमानित होकर भी पत्नी धर्म निभाती हूँ,
करवा चौथ व तीज का व्रत कर लंबी उम्र मांगती हूँ,
मुझे समझना आसान नहीं ।
परिवार की खातिर खुद के अरमानों का गला घोंट लेती हूँ,
चेहरे की मुस्कान के पीछे दिल के हर ग़म छुपा लेती हूँ,
मुझे समझना आसान नहीं ।
भाई-बहन की परवरिश की खातिर बाज़ार में बिक जाती हूँ,
अपने आत्मसम्मान को भुला जिंदगी की बाज़ी खेल जाती हूँ,
मुझे समझना आसान नहीं ।
बचपन बीता जहां उसे पराया कह विदा कर दी जाती हूँ,
अनजान लोगों और घर को अपना बनाने में उम्र बिता देती हूँ
मुझे समझना आसान नहीं ।
राह पर चलते हुए ऑफिस में काम करते हुए फब्तियां सुनती हूँ,
हर औरत की जिंदगी का हिस्सा है यह सोच टाल जाती हूँ,
मुझे समझना आसान नहीं ।
हर कठिनाईयों के बाद जब सफलता की सीढ़ियां चढ़ जाती हूँ,
चरित्र पर न जाने अपने कैसे कैसे लांछन सहती हूँ,
मुझे समझना आसान नहीं ।
घड़ी की सुइयों सी भागती रहती कभी थकती नहीं हूँ,
कोई भी राह हो कैसा भी सफर हो कभी रुकती नहीं हूँ,
मुझे समझना आसान नहीं ।
हिमालय चढ़ आसमान में उड़ अपना साहस दिखा जाती हूँ,
वक्त पड़े तो कोमलांगी से माँ दुर्गा बन संहार कर जाती हूँ,
मुझे समझना आसान नहीं ।
दिल मे दर्द छिपाकर अपने जख्मों पर खुद ही मलहम लगाती हूँ,
सीने में कितने ही सवाल लिए एक दिन खामोश गुज़र जाती हूँ,
मुझे समझना आसान नहीं ।
सृजन करती हूँ न जाने कितने कष्ट हंसते हंसते सह जाती हूँ,
इंसान नहीं पुरूष की नजरों में बस एक स्त्री बनकर रह जाती हूँ,
इसीलिए मुझे समझना आसान नहीं।
डॉ अंजू बेनीवाल
समाजशास्त्री
राजकीय मीरा कन्या महाविद्यालय उदयपु
इस लेख में इस्तेमाल की गई फोटो Canva की रॉयल्टी-फ्री गैलरी से ली गई है।
1 comment
Woww grate maam