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शिक्षकों से शैक्षणिक कार्य के साथ BLO का कार्य करवाना कितना उचित

Reported By : Padmavat Media
Published : December 3, 2025 11:36 AM IST
“शिक्षकों से शैक्षणिक कार्य के साथ BLO का कार्य करवाना कितना उचित”
आलेख : डॉ राकेश वशिष्ठ, वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादकीय लेखक
भारतीय चुनाव आयोग द्वारा SIR प्रक्रिया पूरे भारत में लागू है और इस कार्य में शिक्षा विभाग के शिक्षक उलझे हुए है छात्र छात्राओं की पढ़ाई ठप है और परीक्षाएं निकट हैं, ऐसे में शैक्षणिक कार्य प्रभावित हो रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या विद्यार्थियों के भविष्य और शिक्षा को ताक पर रखकर शिक्षकों से क्या BLO कार्य करवाया जाना कहां तक उचित है? शिक्षकों को शिक्षण व्यवस्था के अतिरिक्त कार्यभार सौंपने के कारण शिक्षण की गुणवत्ता में तो कमी आई ही है, साथ ही शिक्षकों का मनोबल भी टूटने लगा है। राज्य सरकार ने शिक्षकों को अन्य कार्यों में शामिल करने के बाद उन्हें कक्षा व बच्चों की पढ़ाई के अतिरिक्त आंकड़े जुटाने, दूसरे विभागों के कार्य करने में अधिक समय देना पड़ता है। विभिन्न विभागों के कई प्रकार के सर्वे, जनगणना, वोटर लिस्ट सहित अन्य कई कार्यों को लेकर बीएलओ के रूप में 3500 शिक्षकों को जिम्मेदारी सौंपी गई है। इस वजह से जिस शिक्षक के पास बीएलओ का चार्ज है, उसके पास इतने अतिरिक्त कार्य होते है कि वह अपने मूल काम की तरफ ध्यान ही नहीं दे पाता है।
क्या है SIR– विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) एक प्रक्रिया है चुनाव आयोग इसके जरिए मतदाता सूची को अपडेट करता है। आपको मालूम हो कि कई बार किसी मतदाता का निधन हो चुका होता है लेकिन उसका नाम वोटल लिस्ट में दर्ज रहता है कई बार किसी व्यक्ति की उम्र 18 वर्ष यानी वोट देने लायक हो जाती है लेकिन उसका नाम वोटर लिस्ट में होता ही नहीं है ऐसी स्थिति में एसआईआर के जरिए मतदाता सूची से नाम हटाए या ऐड किए जाते हैं।
कौन है BLO – बूथ लेवल ऑफिसर यानी बीएलओ के लिए कोई अलग से बहाली नहीं होती है बल्कि BLO की जिम्मेदारी सरकारी स्कूलों के शिक्षक, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, पटवारी/लेखपाल/अमीन, पंचायत सचिव/ग्राम सेवक, बिजली बिल रीडर, पोस्टमैन और स्वास्थ्य कार्यकर्ता (MPW/ANM आदि) को ही दी जाती है। अभी एसआईआर के जरिए फर्जी मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट हटाने और सही मतदाताओं के नाम जोड़ने का काम किया जा रहा है इस कार्य में बीएलओ को लगाया गया है एक तरह से बीएलओ सबसे निचले स्तर का चुनाव अधिकारी होता है।
BLO पर क्या वाकई दबाव है?– हाल के दिनों में कुछ राज्यों में बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLO) के जान देने के मामलों ने चुनावी व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। आरोप लगाया जा रहा है कि बीएलओ पर इतना काम थोप दिया जाता है कि मानसिक दबाव बढ़ जाता है। लेकिन जब इस काम का वास्तविक गणित समझते हैं, तो तस्वीर कुछ और ही दिखती है। एक बूथ में औसतन 800 से 1200 वोटर होते हैं यानी लगभग 300 घर इन घरों में बीएलओ को सिर्फ दो बार जाना होता है एक बार फॉर्म देने और दूसरी बार फॉर्म लेने पूरा काम चुनाव आयोग ने 30 दिनों की अवधि में बांटा है यानी रोजाना 20 घरों तक जाना ही काफी है। इतना वर्कलोड तो एक ई-कॉमर्स डिलीवरी ब्वॉय रोज 30–60 घर कवर करके आराम से कर लेता है। फिर सवाल उठता है कि क्या वाकई BLO पर दबाव उतना है, जितना बताया जा रहा है या सच्चाई उससे अलग है। हालांकि हमें यह भी समझना होगा कि घर-घर जाने के अलावा हर बीएलओ को अपने दफ्तर में बैठकर काफी पेपरवर्क भी करना है। इसी बीच मतदाता सूची का विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान इन दिनों विवादों में आ गया है। आरोप है कि काम के दबाव के चलते कई बूथ लेवल अफसरों (BLOs) ने जान दे दी। कहा जा रहा है कि 20 दिन में दो दर्जन से ज्यादा बीएलओ की मौत हुई है। ख़ुदकुशी करने वाले एक बीएलओ की जेब से एसआईआर के काम का दबाव होने के चलते जान देने संबंधी नोट मिलने की भी बात सामने आई है। चुनाव आयोग ‘सब कुछ ठीक है’ का संदेश-संकेत दे रहा है। लेकिन क्या वाकई सब कुछ ठीक है? बीएलओ पर काम का दबाव है? या बीएलओ आराम से अपना काम कर रहे हैं? इन सवालों का जवाब ज्वलंत और चिंतनीय है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) 2009: अधिनियम की धारा 27 के अनुसार, शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में नहीं लगाया जाना चाहिए। केवल कुछ मामलों में ही अपवाद हैं, जैसे दशकीय जनगणना, आपदा राहत, और संसदीय, राज्य एवं स्थानीय निकायों के चुनाव। बीएलओ का कार्य शिक्षकों की प्राथमिक शिक्षण जिम्मेदारियों में हस्तक्षेप करता है। मुझे निजी तौर पर लगता है कि इस बारे में केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को गहनता से विचार करना चाहिए और छात्र छात्राओं के भविष्य को देखते हुए शिक्षकों को शैक्षणिक कार्यों को सुचारू संचालन हेतु तमाम गैर शैक्षणिक कार्यों से मुक्त रखना चाहिए ताकि उन पर शैक्षणिक कार्यों के अलावा अन्य कोई दबाव ना हो।
आलेख : डॉ राकेश वशिष्ठ, वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादकीय लेखक

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