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महिला सुरक्षा पर बड़ा सवाल: डर, शर्म और सामाजिक दबाव के कारण आखिर क्यों चुप रह जाती हैं महिलाएं?

Reported By : Padmavat Media
Published : August 18, 2026 2:49 AM IST

एक महिला की खामोशी के पीछे छिपा डर, शर्म और समाज का वह चेहरा, जिसे हम अक्सर देखना नहीं चाहते

फोटो क्रेडिट : एआई द्वारा निर्मित सांकेतिक चित्र

“सफर के दौरान एक अजनबी मेरे स्तनों को छू रहा था, मगर मैं कुछ बोल नहीं पाई”

एक महिला की खामोशी के पीछे छिपा डर, शर्म और समाज का वह चेहरा, जिसे हम अक्सर देखना नहीं चाहते

हम नारी सम्मान की बातें तो बहुत करते हैं, लेकिन क्या सच में महिलाओं के साथ खड़े होते हैं?

हम गर्व से कहते हैं कि भारत महान देश है। हमारी संस्कृति में नारी को शक्ति का स्वरूप माना जाता है, बेटी को देवी कहा जाता है और महिलाओं के सम्मान की बातें सदियों से हमारे संस्कारों का हिस्सा रही हैं। लेकिन कभी-कभी जिंदगी की कोई घटना इन तमाम दावों के सामने ऐसा आईना रख देती है, जिसमें समाज का वह चेहरा दिखाई देता है जिसे हम शायद देखना नहीं चाहते। मैं भी वर्षों तक एक ऐसी ही घटना को अपने भीतर दबाकर बैठी रही। आज जब उस घटना को याद करती हूं तो सबसे ज्यादा तकलीफ उस व्यक्ति के गलत व्यवहार की नहीं, बल्कि अपनी उस खामोशी की होती है, जिसे उस समय मेरे डर ने जन्म दिया था।

साल 2012 की वह रात आज भी नहीं भूल पाई

साल 2012 की बात है। मैं परीक्षा देने के लिए गोड्डा से रांची बस से जा रही थी। रात का समय था और मैं अकेली यात्रा कर रही थी। हमारे यहां उस समय ऐसी कोई विशेष व्यवस्था नहीं थी कि अकेली यात्रा करने वाली महिला को ऐसी सीट मिल सके जिसके आसपास महिलाओं की मौजूदगी हो या बगल की सीट खाली रखी जाए। मेरे पास एक युवक आकर बैठ गया। शुरुआत में उसके व्यवहार से मुझे ऐसा कुछ महसूस नहीं हुआ जिससे मैं असहज होती। वह भी दूसरे यात्रियों की तरह सामान्य लग रहा था और मुझे जरा भी अंदाजा नहीं था कि आगे का सफर मेरे लिए जिंदगी की ऐसी याद बन जाएगा, जिसे मैं वर्षों बाद भी पूरी तरह भुला नहीं पाऊंगी।

पहली बार लगा, शायद यह गलती से हुआ होगा

बस आगे बढ़ती रही। अंदर तेज आवाज में गाने बज रहे थे और ज्यादातर यात्री अपने-अपने सफर में व्यस्त थे। कुछ देर बाद उस युवक ने सोने का बहाना करते हुए मेरे साथ अनुचित व्यवहार करना शुरू किया। पहली बार जब मुझे उसके हाथ का एहसास हुआ तो मैंने खुद को यह कहकर शांत करने की कोशिश की कि शायद वह नींद में है और गलती से ऐसा हो गया होगा। मैंने सीट पर करवट बदली और सोचा कि बात यहीं खत्म हो जाएगी। उस समय शायद मैं खुद भी यह स्वीकार नहीं करना चाहती थी कि मेरे पास बैठा व्यक्ति जानबूझकर मेरी व्यक्तिगत सीमा का उल्लंघन कर रहा था।

जब समझ आया कि यह गलती नहीं, जानबूझकर किया जा रहा है

कुछ समय बाद मेरी आंख खुली तो मुझे एहसास हुआ कि वह व्यक्ति जानबूझकर मेरे शरीर को छू रहा था। उस पल मैं भीतर तक सन्न रह गई। मेरे आसपास लोग थे, बस चल रही थी, लेकिन मुझे ऐसा लग रहा था जैसे उस पूरी भीड़ के बीच मैं बिल्कुल अकेली हूं। मन में गुस्सा भी था, डर भी था और यह समझ नहीं आ रहा था कि आखिर मैं क्या करूं। मेरे पास आवाज उठाने का पूरा अधिकार था, लेकिन उस अधिकार का इस्तेमाल करने की हिम्मत उस समय मेरे भीतर नहीं थी। मेरे मन में एक साथ कई सवाल उठने लगे और उन सवालों ने मेरी आवाज को वहीं रोक दिया।

मुझे अपराधी से ज्यादा समाज की प्रतिक्रिया का डर था

सबसे बड़ा डर यह था कि यदि मैंने बस में शोर मचाया तो लोग क्या कहेंगे। बस में कुछ लोग मेरे परिचित भी हो सकते थे। मुझे डर था कि यदि किसी को पता चल गया तो बात पूरे शहर में फैल सकती है और उसके बाद लोग मेरे साथ हुई घटना पर बात करने के बजाय मेरे बारे में बातें करेंगे। परिवार क्या सोचेगा, परिचित क्या सोचेंगे और समाज किस नजर से देखेगा—इन तमाम सवालों ने मुझे भीतर से जकड़ लिया। आज जब पीछे मुड़कर देखती हूं तो समझ आता है कि उस समय मैं केवल उस व्यक्ति से नहीं डर रही थी, मैं उस सामाजिक सोच से डर रही थी जिसमें किसी महिला के साथ गलत होने के बाद भी कई बार सबसे पहले सवाल उसी महिला से किए जाते हैं।

मेरी खामोशी का फायदा उठाया गया

मैंने किसी से कुछ नहीं कहा। मैं चुप रही और मन ही मन यही चाहती रही कि किसी तरह यह सफर खत्म हो और मैं वहां से निकल जाऊं। मेरी इसी खामोशी का फायदा उठाया गया और वह व्यक्ति रास्ते भर मेरे साथ अनुचित व्यवहार करता रहा। मैं चाहती थी कि कोई मेरी परेशानी समझे, कोई मेरी ओर देखे और पूछे कि क्या मैं ठीक हूं, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। बस अपनी गति से चलती रही, यात्री अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त रहे और मैं अपने भीतर चल रहे डर और बेचैनी को दबाकर बैठी रही। उस रात मुझे पहली बार एहसास हुआ कि भीड़ में होना और सुरक्षित महसूस करना दो बिल्कुल अलग बातें हैं।

आज वर्षों बाद सबसे बड़ा सवाल यही है—मैं चुप क्यों रही?

समय बीत गया। जिंदगी आगे बढ़ गई और वह घटना भी मेरी यादों के किसी कोने में दब गई। लेकिन वर्षों बाद जब अचानक वह घटना फिर याद आई तो मेरे मन में एक सवाल उठा—मैं उस समय चुप क्यों रही? क्या इसलिए कि मेरे साथ कुछ गलत नहीं हुआ था? नहीं। क्या इसलिए कि मुझे आवाज उठाने का अधिकार नहीं था? बिल्कुल नहीं। मैं चुप इसलिए रही क्योंकि मुझे डर था कि मेरी आवाज सुनने के बाद समाज मेरा साथ देगा या मेरी ही जिंदगी को सवालों के घेरे में खड़ा कर देगा। और यही बात आज भी मुझे सोचने पर मजबूर करती है कि अगर एक महिला को अपने साथ हुए गलत व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाने से पहले समाज की प्रतिक्रिया के बारे में सोचना पड़े, तो फिर हम महिला सुरक्षा के बारे में कितनी भी बातें कर लें, कहीं न कहीं हमारी सोच में अभी भी बहुत कुछ बदलना बाकी है।

क्या ऐसी घटनाएं केवल एक महिला की कहानी हैं?

आज मैं सोचती हूं कि शायद मैं अकेली नहीं हूं। न जाने कितनी लड़कियां और महिलाएं रोज बसों, ट्रेनों और सार्वजनिक स्थानों पर ऐसी परिस्थितियों का सामना करती हैं। कितनी महिलाएं असहज होकर भी चुप रहती हैं, कितनी अपने परिवार की चिंता में शिकायत नहीं करतीं और कितनी इस डर से अपनी बात किसी को नहीं बतातीं कि कहीं समाज उन्हें ही दोषी न ठहरा दे। ऐसी बहुत सी घटनाएं कभी पुलिस तक नहीं पहुंचतीं, कभी परिवार तक नहीं पहुंचतीं और कभी किसी समाचार का हिस्सा भी नहीं बनतीं। वे केवल उस महिला की स्मृति बनकर रह जाती हैं, जिसे वह वर्षों तक अपने भीतर लेकर चलती रहती है।

सवाल बेटियों से ज्यादा हमें अपने बेटों से पूछना होगा

हम अपनी बेटियों को बचपन से समझाते हैं कि अकेले मत जाना, देर रात बाहर मत निकलना, अजनबियों से सावधान रहना और हर कदम संभलकर रखना। सावधानी जरूरी है, लेकिन क्या केवल बेटियों को सावधान करना ही समाधान है? क्या हमने अपने बेटों को उतनी ही गंभीरता से यह सिखाया है कि किसी महिला की इच्छा, उसकी व्यक्तिगत सीमा और उसका सम्मान सर्वोपरि है? हमें यह समझना होगा कि महिला सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर डालकर हम अपने समाज को सुरक्षित नहीं बना सकते। जिस दिन हर लड़के को यह समझ आ जाएगा कि किसी महिला की मर्यादा का सम्मान करना उसका कर्तव्य है, उस दिन महिला सुरक्षा की दिशा में वास्तविक बदलाव शुरू होगा।

महिला की चुप्पी को उसकी सहमति समझना सबसे बड़ी भूल है

आज भी समाज में एक खतरनाक सोच मौजूद है कि यदि महिला ने उसी समय विरोध नहीं किया तो शायद उसे आपत्ति नहीं थी। यह सोच पूरी तरह गलत है। किसी महिला का चुप रह जाना उसकी सहमति नहीं होता। कई बार वह डर होता है, कई बार सदमा होता है, कई बार सामाजिक दबाव होता है और कई बार व्यक्ति केवल उस परिस्थिति से सुरक्षित निकल जाना चाहता है। इसलिए किसी महिला की खामोशी को उसके खिलाफ इस्तेमाल करने के बजाय हमें उसके पीछे छिपे डर को समझने की जरूरत है।

हमें ऐसा समाज चाहिए जहां महिला को आवाज उठाने से डर न लगे

महिला सुरक्षा केवल कानून बनाने, अभियान चलाने या कुछ नारे लिख देने से सुनिश्चित नहीं होगी। इसके लिए परिवार, समाज, सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था और हर नागरिक को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। यदि किसी सार्वजनिक स्थान पर किसी महिला के साथ गलत व्यवहार होता दिखाई दे तो आसपास के लोगों को तमाशबीन बने रहने के बजाय मदद के लिए आगे आना चाहिए। एक महिला को यह भरोसा होना चाहिए कि यदि वह आवाज उठाएगी तो उसे अकेला नहीं छोड़ा जाएगा और गलत करने वाले से सवाल किया जाएगा।

उस रात मैं खामोश थी, लेकिन आज मेरी खामोशी सवाल बनकर सामने है

उस रात मैं कुछ नहीं बोल पाई थी। शायद डर ने मेरी आवाज रोक दी थी। लेकिन आज जब उस घटना को याद करती हूं तो लगता है कि मेरी उस खामोशी को केवल मेरी कमजोरी समझना गलत होगा। वह उस समय की मेरी मजबूरी थी। मैं चाहती हूं कि आज की कोई लड़की ऐसी स्थिति में खुद को अकेला महसूस न करे। उसे यह डर न हो कि आवाज उठाने पर उसकी बदनामी होगी। उसे यह भरोसा हो कि उसके साथ गलत होने पर उसका परिवार, समाज और आसपास के लोग उसके साथ खड़े होंगे।

क्योंकि किसी महिला को सुरक्षित महसूस कराने के लिए हमेशा बड़ी-बड़ी बातें और बड़े-बड़े अभियान जरूरी नहीं होते। कभी-कभी उसे केवल इतना भरोसा चाहिए होता है कि यदि उसके साथ गलत होगा तो उसकी आवाज दबाई नहीं जाएगी, बल्कि उसे सुना जाएगा।

पदमावत मीडिया का सवाल—क्या हम सच में बदल पाए हैं?

महिलाओं की सुरक्षा के बड़े-बड़े दावों, जागरूकता अभियानों और कानूनों के बावजूद क्या हम उस डर को खत्म कर पाए हैं, जो आज भी कई महिलाओं को अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने से रोकता है?

अगर किसी महिला के साथ गलत होने के बाद उसकी पहली चिंता अपराधी नहीं, बल्कि यह हो कि “लोग क्या कहेंगे?”, तो हमें केवल सुरक्षा व्यवस्था पर नहीं, बल्कि अपनी सामाजिक सोच पर भी सवाल उठाना होगा।

बदलाव तब आएगा, जब किसी महिला की आवाज उठे और समाज उसकी आवाज को दबाने के बजाय उसके साथ खड़ा हो।

— एक महिला की आपबीती
पहचान गोपनीय रखने के अनुरोध पर नाम प्रकाशित नहीं किया गया।

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