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सलूंबर में बेंच टेरेसिंग से बदली खेती की तस्वीर, 89.4 हेक्टेयर भूमि विकसित, 447 किसानों को मिला लाभ

Reported By : Padmavat Media
Published : August 17, 2026 12:21 PM IST

पहाड़ी और पथरीली जमीन पर सीढ़ीनुमा खेतों का विकास, जल एवं मृदा संरक्षण के साथ किसानों के लिए बढ़ रहे खेती के अवसर

सलूंबर • कृषि • जल एवं मृदा संरक्षण

पथरीली पहाड़ियों पर खेती की नई इबारत लिख रहा सलूंबर, बेंच टेरेसिंग से बदली जमीन की तस्वीर

कलेक्टर मुहम्मद जुनैद पी.पी. की पहल से पांच माह में 89.4 हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि खेती योग्य बनी, 447 किसानों को मिला लाभ;
135 नए कार्यों से 27 हेक्टेयर और भूमि विकसित करने की तैयारी

सलूंबर। पहाड़ों की ढलान, पथरीली जमीन और वर्षा के पानी के तेज बहाव के बीच खेती करना सलूंबर के किसानों के लिए लंबे समय से चुनौती रहा है। अब जिला प्रशासन ने इसी चुनौती को अवसर में बदलने की दिशा में कदम बढ़ाया है। जिला कलक्टर एवं जिला निर्वाचन अधिकारी मुहम्मद जुनैद पी.पी. की पहल पर जिले में बेंच टेरेसिंग तकनीक के माध्यम से ढलानदार और कम उपयोग में आने वाली भूमि को सीढ़ीनुमा खेतों में विकसित किया जा रहा है। इस पहल से न केवल किसानों को अतिरिक्त कृषि भूमि मिल रही है, बल्कि मिट्टी और जल संरक्षण को भी बढ़ावा मिल रहा है।

जिले में पिछले करीब पांच माह में बेंच टेरेसिंग के माध्यम से 89.4 हेक्टेयर अतिरिक्त कृषि भूमि विकसित की जा चुकी है। इससे 447 किसान लाभान्वित हुए हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में खेती के लिए यह पहल विशेष महत्व रखती है, क्योंकि यहां भूमि की ढलान और पथरीली सतह के कारण वर्षा का पानी तेजी से बह जाता है और मिट्टी का कटाव भी होता है।

ढलान को बनाया खेत, पानी को दिया ठहराव

बेंच टेरेसिंग में पहाड़ी ढलान को सीढ़ीनुमा खेतों में बदला जाता है। इससे खेत का ढलान नियंत्रित होता है और वर्षा का पानी सीधे नीचे बहने के बजाय खेत में ठहरने का अवसर मिलता है। पानी के ठहराव से मिट्टी में नमी बनी रहती है और मिट्टी के कटाव को कम करने में मदद मिलती है।

सलूंबर जैसे पहाड़ी और वर्षा आधारित क्षेत्र में इस तकनीक का महत्व और बढ़ जाता है। जिस जमीन पर ढलान और पत्थरों के कारण खेती करना मुश्किल था, वहां सीढ़ीनुमा खेत तैयार होने से किसानों को अतिरिक्त कृषि क्षेत्र उपलब्ध हो रहा है। इससे कृषि के साथ-साथ जल एवं मृदा संरक्षण का उद्देश्य भी एक साथ पूरा हो रहा है।

447 किसानों की जमीन को मिला नया अवसर

अब तक पूर्ण हुए बेंच टेरेसिंग कार्यों से 447 किसानों को सीधा लाभ मिला है। कुल 89.4 हेक्टेयर भूमि को खेती योग्य बनाया गया है। इससे किसानों को वर्षा आधारित खेती के लिए अतिरिक्त जमीन उपलब्ध हुई है।

इन कार्यों का लाभ केवल जमीन का क्षेत्र बढ़ने तक सीमित नहीं है। खेतों में पानी रोकने और मिट्टी के कटाव को कम करने से भूमि की उपयोगिता बढ़ाने की दिशा में भी यह महत्वपूर्ण कदम है। आने वाले समय में इन क्षेत्रों में कृषि गतिविधियों को और मजबूती मिलने की संभावना है।

135 नए कार्यों से 27 हेक्टेयर और भूमि होगी विकसित

जिला प्रशासन ने बेंच टेरेसिंग को आगे बढ़ाने के लिए 135 नए कार्य प्रस्तावित किए हैं। इनमें झल्लारा में 20, सलूंबर में 50, जयसमंद में 33 और लसाड़िया में 32 कार्य शामिल हैं। इन कार्यों के पूरा होने पर करीब 135 किसानों को लाभ मिलने और लगभग 27 हेक्टेयर अतिरिक्त कृषि भूमि विकसित होने की संभावना है।

इस विस्तार से साफ है कि प्रशासन इस पहल को केवल कुछ क्षेत्रों तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि जिले के अधिक से अधिक पहाड़ी और ढलानदार इलाकों में इसका लाभ पहुंचाने की दिशा में काम कर रहा है।

झल्लारा, सलूंबर और लसाड़िया में दिखा असर

बेंच टेरेसिंग के कार्यों का प्रभाव जिले के विभिन्न क्षेत्रों में सामने आया है। झल्लारा क्षेत्र में 191 कार्य पूर्ण किए जा चुके हैं, जिनसे 191 किसानों को लाभ मिला और 38.20 हेक्टेयर अतिरिक्त कृषि भूमि विकसित हुई।

सलूंबर क्षेत्र में 135 कार्य पूरे हुए हैं। इनसे 135 किसानों को लाभ मिला और 27 हेक्टेयर भूमि खेती योग्य बनी। वहीं लसाड़िया क्षेत्र में 121 बेंच टेरेसिंग कार्य पूर्ण किए जा चुके हैं, जिनसे 121 किसानों को लाभ मिला और 24.20 हेक्टेयर अतिरिक्त कृषि भूमि विकसित हुई।

इन आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि पहाड़ी एवं पथरीली जमीन को व्यवस्थित तरीके से कृषि उपयोग में लाने की दिशा में कार्य तेजी से आगे बढ़ रहा है।

89.4 हेक्टेयर
अतिरिक्त कृषि भूमि विकसित
447 किसान
अब तक लाभान्वित

जल संरक्षण और खेती—दोनों लक्ष्य एक साथ

बेंच टेरेसिंग का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे भूमि विकास के साथ जल संरक्षण भी जुड़ जाता है। पहाड़ी जमीन पर बारिश के दौरान पानी तेजी से नीचे की ओर बहता है। इसके साथ मिट्टी भी बह जाती है। खेतों को सीढ़ीनुमा स्वरूप देने से पानी के बहाव की गति नियंत्रित होती है और जमीन में नमी बनाए रखने में मदद मिलती है।

इससे वर्षा आधारित खेती करने वाले किसानों के लिए परिस्थितियां बेहतर हो सकती हैं। जिला प्रशासन का उद्देश्य भी केवल पथरीली जमीन को खेत में बदलना नहीं, बल्कि ऐसी कृषि व्यवस्था तैयार करना है जिसमें पानी और मिट्टी दोनों का संरक्षण हो तथा उपलब्ध भूमि का अधिकतम उपयोग किया जा सके।

मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान और प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना से जुड़ा प्रयास

जिले में बेंच टेरेसिंग के कार्य मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान और प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत किए जा रहे हैं। इन योजनाओं के माध्यम से जल संरक्षण, मृदा संरक्षण और कृषि क्षेत्र के विस्तार को एक साथ आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।

पहाड़ी क्षेत्रों में जहां प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण खेती की संभावनाएं सीमित हैं, वहां इस प्रकार के भूमि एवं जल संरक्षण कार्य किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं।

पथरीली जमीन को उत्पादक बनाने की सोच

सलूंबर जिले का बड़ा हिस्सा पहाड़ी एवं पथरीले भू-भाग से जुड़ा है। ऐसे क्षेत्रों में हर जमीन पर परंपरागत तरीके से खेती करना आसान नहीं है। कई जगह ढलान इतनी अधिक है कि बारिश का पानी खेत में ठहरने के बजाय तेजी से बह जाता है।

ऐसी परिस्थितियों में बेंच टेरेसिंग प्रशासन के लिए एक ऐसा माध्यम बन रही है, जिसके जरिए प्राकृतिक भू-आकृति को ध्यान में रखते हुए जमीन का उपयोग बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। इससे किसानों को अपनी ही जमीन पर अतिरिक्त कृषि क्षेत्र उपलब्ध कराने की संभावना बन रही है।

कृषि क्षेत्र के विस्तार के साथ किसानों के लिए बढ़ेंगे अवसर

सलूंबर में करीब 34 हजार हेक्टेयर भूमि पर कृषि गतिविधियां होती हैं। यहां मक्का, गेहूं और चना जैसी फसलें प्रमुख रूप से ली जाती हैं। इसके बावजूद पहाड़ी एवं पथरीले भू-भाग का एक हिस्सा अभी भी कृषि की दृष्टि से पूरी तरह उपयोग में नहीं आ पाता।

ऐसे में बेंच टेरेसिंग के जरिए अनुपयोगी या कम उपयोग वाली भूमि को कृषि योग्य बनाना किसानों के लिए अतिरिक्त अवसर पैदा कर सकता है। आने वाले समय में यदि इन खेतों में सिंचाई, नमी संरक्षण और बेहतर कृषि तकनीकों का समुचित उपयोग होता है तो इससे उत्पादन बढ़ाने की संभावनाएं भी मजबूत हो सकती हैं।

केरल के अनुभव से सलूंबर तक पहुंची तकनीक

जिला कलक्टर मुहम्मद जुनैद पी.पी. का मूल संबंध केरल से है। केरल में अधिक वर्षा और ढलानदार भू-भाग वाले क्षेत्रों में जल एवं मृदा संरक्षण के लिए बेंच टेरेसिंग जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता रहा है। सलूंबर की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए इस तकनीक को यहां उपयोगी मानते हुए प्रशासन द्वारा इसे बढ़ावा दिया जा रहा है।

स्थानीय परिस्थितियों और उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप किसी तकनीक को अपनाकर उसका उपयोग किसानों के हित में करना इस पहल की महत्वपूर्ण विशेषता है।

सिर्फ खेत नहीं, पानी और मिट्टी भी बचाने की कोशिश

बेंच टेरेसिंग के जरिए विकसित खेत आने वाले समय में केवल कृषि उत्पादन का माध्यम नहीं बनेंगे, बल्कि जल और मृदा संरक्षण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। बारिश के पानी को रोकने से खेतों में नमी बनी रहने की संभावना बढ़ती है और मिट्टी के बहाव को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।

इससे लंबे समय में भूमि की उत्पादकता बनाए रखने और वर्षा आधारित कृषि को अधिक टिकाऊ बनाने में सहायता मिल सकती है।

प्रशासनिक पहल से किसानों के बीच बढ़ी उम्मीद

अब तक 89.4 हेक्टेयर अतिरिक्त कृषि भूमि का विकास और 447 किसानों को मिला लाभ इस पहल की शुरुआती तस्वीर सामने रखता है। वहीं 135 नए कार्यों के प्रस्ताव से संकेत मिलता है कि प्रशासन इस मॉडल को आगे भी विस्तार देने की दिशा में काम कर रहा है।

पथरीली और ढलानदार जमीन को खेती योग्य बनाने की यह पहल सलूंबर में कृषि विस्तार के साथ जल एवं मृदा संरक्षण को जोड़ने का प्रयास है। यदि प्रस्तावित कार्य भी निर्धारित लक्ष्य के अनुसार पूरे होते हैं तो आने वाले समय में और किसानों को इसका लाभ मिल सकता है।

सलूंबर में बेंच टेरेसिंग की यह पहल मूल रूप से एक ऐसी सोच को सामने रखती है, जिसमें मुश्किल भू-भाग को बाधा मानने के बजाय उसकी प्रकृति के अनुरूप समाधान तलाशकर उसे किसानों के लिए उपयोगी बनाने का प्रयास किया जा रहा है। पहाड़ की ढलानों पर बनती सीढ़ीनुमा खेतों की कतारें आने वाले समय में न केवल कृषि विस्तार की तस्वीर बदल सकती हैं, बल्कि जल और मिट्टी संरक्षण के लिए भी एक उपयोगी उदाहरण बन सकती हैं।

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