✦ पदमावत मीडिया | संपादकीय ✦
भगवान नहीं बदले, बदल गई भीड़ की भक्ति और आस्था का चरित्र
— पवन जैन पदमावत
प्रधान संपादक : पदमावत मीडिया
पिछले कुछ वर्षों में समाज के धार्मिक व्यवहार पर यदि ईमानदारी से दृष्टि डाली जाए, तो एक गहरी और चिंताजनक सच्चाई सामने आती है। कुछ समय पहले तक साईं बाबा जनआस्था के केंद्र में थे। भजन, वाहन, दीवारें और सार्वजनिक मंच—हर जगह साईं बाबा का नाम प्रमुखता से दिखाई देता था। फिर समय बदला और खाटू श्याम श्रद्धा के नए केंद्र बने। हर गाड़ी के पीछे लिखा जाने लगा—हारे का सहारा बाबा श्याम हमारा। अब वर्तमान दौर में सावरिया सेठ की जय-जयकार व्यापक रूप से सुनाई देती है। सवाल यह नहीं है कि कौन-सा भगवान बड़ा है और कौन छोटा, क्योंकि ईश्वर न तुलना का विषय है और न प्रतिस्पर्धा का। असली सवाल यह है कि क्या हमारी भक्ति स्थायी आस्था से उपजी है या केवल चल रही भीड़ और ट्रेंड के अनुसार बदल रही है।
यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि यह विचार किसी भी भगवान, किसी भी संप्रदाय या किसी भी श्रद्धालु के विरोध में नहीं है। भगवान एक हैं, नाम अनेक हैं, मार्ग भिन्न हो सकते हैं, लेकिन चेतना और सत्य एक ही है। समस्या भगवानों में नहीं है, समस्या उस मानसिकता में है जिसने भक्ति को फैशन और धर्म को ट्रेंड में बदल दिया है। आज आस्था का मूल्यांकन विश्वास से नहीं, बल्कि दृश्यता से किया जा रहा है। जिस देवस्थान की रील वायरल हो रही है, जिस नाम पर सोशल मीडिया पर अधिक लाइक मिल रहे हैं, जिस भजन पर व्यूज़ बढ़ रहे हैं। भीड़ बिना विचार किए उसी दिशा में दौड़ पड़ती है।
आज मंदिरों में श्रद्धा से अधिक कैमरे दिखाई देते हैं। हाथ जोड़ने से पहले मोबाइल उठ जाता है। प्रार्थना से पहले फोटो खिंचवाना और मौन साधना की जगह प्रदर्शन—यह सब हमारी बदली हुई धार्मिक चेतना का संकेत है। यदि एक दिन मंदिरों में सेल्फी और वीडियो बनाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया जाए, तो यह भ्रम भी टूट जाएगा कि भीड़ भक्ति के लिए आती है। तब साफ़ हो जाएगा कि कौन वास्तव में ईश्वर के लिए आता है और कौन केवल दिखावे, पहचान और सोशल स्वीकृति के लिए।
धर्म धीरे-धीरे बाज़ार की भाषा बोलने लगा है। भक्ति कंटेंट बन चुकी है और भगवान ब्रांड। कौन-सा देवस्थान ट्रेंड में रहेगा, किस दर्शन से सोशल पहचान बनेगी, किस पोस्ट से प्रसिद्धि मिलेगी—इन्हीं गणनाओं के बीच आस्था का मूल भाव खोता जा रहा है। यह श्रद्धा नहीं, यह बाज़ारीकरण है। यह भक्ति नहीं, यह प्रचार है। जब धर्म आत्मशुद्धि के बजाय आत्मप्रदर्शन का माध्यम बन जाए, तो समाज भीतर से कमजोर होने लगता है।
सबसे गंभीर चिंता का विषय यह है कि जिन लोगों का रिश्ता भगवान से नहीं, बल्कि ट्रेंड से है, उनकी आस्था कभी स्थायी नहीं हो सकती। यदि कल को किसी अन्य विचारधारा या किसी अन्य धर्म का ट्रेंड चल पड़े, तो ऐसे लोगों को दिशा बदलने में अधिक समय नहीं लगेगा। क्योंकि जिनकी भक्ति की जड़ें गहरी नहीं होतीं, वे हवा के साथ बह जाते हैं। धर्म कोई फैशन नहीं है जो मौसम के साथ बदल जाए। आस्था कोई स्टेटस नहीं है जो पोस्ट के साथ शुरू हो और पोस्ट के साथ समाप्त हो जाए।
भगवान कभी नहीं बदलते। वे न भीड़ देखते हैं, न प्रचार, न लाइक और न व्यूज़। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि जब इंसान भक्ति के नाम पर दिखावा करने लगता है, जब धर्म को स्वार्थ, प्रसिद्धि और पहचान का साधन बना लेता है, तब ईश्वर भी समय आने पर चेतावनी देता है। उस दिन न ट्रेंड काम आता है, न भीड़, न पोस्टर और न ही सोशल पहचान।
भक्ति का अर्थ शोर नहीं, संयम होता है।
आस्था का अर्थ प्रदर्शन नहीं, विश्वास होता है।
और धर्म का अर्थ ट्रेंड नहीं, चरित्र होता है।
आज भी समय है। भगवान को बदलने की आवश्यकता नहीं है, आवश्यकता है अपनी सोच को सुधारने की। क्योंकि जिस दिन ईश्वर ने इंसान की नीयत का हिसाब लेना शुरू किया, उस दिन इंसान के पास पछतावे के अतिरिक्त कुछ भी शेष नहीं रहेगा।
पवन जैन पदमावत
प्रधान संपादक
पदमावत मीडिया
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