बच्चों में समानता, सम्मान और सहमति की समझ बचपन से विकसित करना जरूरी : चारू सिन्हा
हैदराबाद । अपराध अन्वेषण विभाग, भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो एवं महिला एवं बाल सुरक्षा की महानिदेशक चारू सिन्हा ने कहा कि यदि हम ऐसे बच्चों का पालन-पोषण करना चाहते हैं जो समानता, सम्मान और सहमति को समझें, तो हमें सबसे पहले लड़के और लड़कियों की परवरिश के अपने तरीके में बदलाव लाना होगा। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या कोई लड़का बिना किसी निर्णय या आलोचना के अपनी भावनाओं और कमजोरियों को व्यक्त कर सकता है? उन्होंने कहा कि बच्चों को बचपन से ही भावनाओं को व्यक्त करने, दूसरों की सीमाओं का सम्मान करने और जिम्मेदारी तथा सहानुभूति को समझने का अवसर मिलना चाहिए।
चारू सिन्हा ने यह विचार शनिवार को हैदराबाद स्थित डॉ. बी.आर. आंबेडकर विश्वविद्यालय के वेहब परिसर में स्टैंड विद हर अभियान के छठे संवाद कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए। कार्यक्रम का विषय था—बचपन से ही लड़कियों और लड़कों को समानता, सम्मान और सहमति के बारे में कैसे सिखाया जाए।

परवरिश में संवाद और व्यवहार की अहम भूमिका
कार्यक्रम में सिनेमा, शिक्षा, समाजशास्त्र, उद्यमिता, शोध एवं सामाजिक नेतृत्व से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। संवाद में बच्चों की परवरिश में माता-पिता की भूमिका, समानता, सम्मान, भावनाओं, व्यक्तिगत सीमाओं और सहमति जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि रोजमर्रा की पारिवारिक आदतें, बच्चों से होने वाली बातचीत, उनसे रखी जाने वाली अपेक्षाएं और उनके व्यवहार पर माता-पिता की प्रतिक्रिया बच्चों की सोच को गहराई से प्रभावित करती है।
संवाद में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि घर का वातावरण बच्चों में लैंगिक समानता की समझ विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि परिवार में लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग मानदंड बनाए जाते हैं, तो इससे लैंगिक रूढ़ियां मजबूत हो सकती हैं। इसके विपरीत, यदि बच्चों को अपनी भावनाएं व्यक्त करने, सवाल पूछने, सामाजिक धारणाओं पर विचार करने और एक-दूसरे की सीमाओं का सम्मान करने का अवसर दिया जाए तो इससे अधिक समान और सम्मानजनक समाज की नींव रखी जा सकती है।
कार्यक्रम में चारू सिन्हा के साथ अभिनेत्री एवं अन्नपूर्णा फिल्म एवं मीडिया महाविद्यालय की निदेशक अमला अक्किनेनी, प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक एवं पटकथा लेखिका वी. नंदिनी रेड्डी, उद्यमी एवं रायलसीमा रुचुलु के संस्थापक उत्तम रेड्डी, हैदराबाद विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र की प्रोफेसर अनुरेखा चारी वाघ तथा शोधकर्ता, चित्रकार एवं विद्यार्थी नेता चिन्मय चिन्नागरी ने अपने विचार रखे।
सकारात्मक और सक्रिय परवरिश की जरूरत
चारू सिन्हा ने चर्चा के दौरान कहा कि माता-पिता को केवल किसी समस्या के सामने आने के बाद प्रतिक्रिया देने वाली परवरिश के बजाय सकारात्मक और सक्रिय परवरिश की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से लड़कों को अपनी भावनाएं और कमजोरियां व्यक्त करने के लिए सुरक्षित वातावरण देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि बच्चों को बचपन से ही यह समझाना जरूरी है कि अपनी भावनाओं को व्यक्त करना कमजोरी नहीं है। इसके साथ ही उन्हें जिम्मेदारी, सहानुभूति और दूसरों के सम्मान का महत्व भी समझाया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि बच्चे घर में जो देखते हैं, उसे केवल सुनते ही नहीं बल्कि अपने व्यवहार में भी उतारते हैं। इसलिए माता-पिता का आचरण बच्चों के लिए सबसे प्रभावशाली शिक्षा बन जाता है। घर में रिश्तों, भावनाओं और समानता को लेकर जिस तरह का व्यवहार होता है, उसका प्रभाव बच्चों की सोच और भविष्य के संबंधों पर पड़ता है।
विशेषज्ञों ने रखे अपने विचार
अमला अक्किनेनी ने कहा कि जिम्मेदार और संवेदनशील व्यक्ति तैयार करने के लिए केवल औपचारिक शिक्षा पर्याप्त नहीं है। बच्चों में विवेक विकसित करना भी आवश्यक है, ताकि वे सही और गलत के बीच अंतर कर सकें, सोच-समझकर निर्णय ले सकें और अपने निर्णयों के परिणामों को समझ सकें।
वी. नंदिनी रेड्डी ने कहा कि बच्चों पर पुरानी धारणाएं और सामाजिक मान्यताएं थोपने के बजाय उनसे बातचीत की जानी चाहिए। माता-पिता को बच्चों को यह समझाना चाहिए कि किसी नियम या अपेक्षा के पीछे क्या कारण है। केवल इस आधार पर व्यवहार तय नहीं किया जाना चाहिए कि समाज में लड़कों और लड़कियों से किस तरह के व्यवहार की अपेक्षा की जाती रही है।
उत्तम रेड्डी ने बदलते डिजिटल दौर में माता-पिता और बच्चों के बीच नियमित संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि माता-पिता को मोबाइल और अन्य उपकरणों से कुछ समय के लिए दूरी बनाकर बच्चों के साथ बातचीत करनी चाहिए। नियमित और खुला संवाद परिवार में विश्वास पैदा करता है तथा बच्चों को अपनी भावनाओं, अनुभवों और परेशानियों के बारे में माता-पिता से बात करने का आत्मविश्वास देता है।
प्रोफेसर अनुरेखा चारी वाघ ने सहमति के विषय पर महत्वपूर्ण बात रखते हुए कहा कि केवल लड़कियों को अपनी इच्छा के विरुद्ध किसी बात के लिए मना करना सिखाना पर्याप्त नहीं है। लड़कों को भी यह समझना होगा कि जब कोई व्यक्ति किसी बात के लिए मना करता है तो उसके निर्णय और सीमा का सम्मान करना आवश्यक है। सहमति का अर्थ केवल अपनी सीमा तय करने का अधिकार नहीं, बल्कि दूसरे व्यक्ति की सीमा को स्वीकार करने और उसका सम्मान करने की जिम्मेदारी भी है।
चिन्मय चिन्नागरी ने कहा कि बच्चे कई बार घर में दिखाई देने वाले व्यवहार को बिना समझे ही अपना लेते हैं। उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभव को साझा करते हुए बताया कि उन्होंने अपने माता-पिता के व्यवहार से जल्दी गुस्सा करने की आदत को सामान्य समझ लिया था और बाद में कॉलेज पहुंचने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि यह व्यवहार सही नहीं था। उनके अनुभव ने यह स्पष्ट किया कि बच्चे केवल माता-पिता द्वारा कही गई बातों से नहीं, बल्कि उनके व्यवहार को देखकर भी बहुत कुछ सीखते हैं।
लैंगिक समानता की शुरुआत घर से
संवाद में यह बात सामने आई कि लैंगिक समानता को बच्चों को केवल बड़े होने के बाद किसी विशेष विषय के रूप में नहीं पढ़ाया जा सकता। इसकी शुरुआत परिवार के रोजमर्रा के व्यवहार से होनी चाहिए। माता-पिता बच्चों से किस भाषा में बात करते हैं, घर की जिम्मेदारियों का बंटवारा किस तरह होता है, बच्चों को अपनी भावनाएं व्यक्त करने की कितनी स्वतंत्रता मिलती है, उनकी व्यक्तिगत सीमाओं का कितना सम्मान किया जाता है और माता-पिता स्वयं किस प्रकार का व्यवहार करते हैं—इन सभी बातों से बच्चों की सोच आकार लेती है।
विशेषज्ञों ने कहा कि लड़कों को सहानुभूति, संवेदनशीलता, भावनात्मक अभिव्यक्ति और सहमति की समझ देना उतना ही जरूरी है, जितना लड़कियों को आत्मविश्वास, अपनी बात रखने की क्षमता और अपनी सीमाएं तय करने के अधिकार के बारे में जागरूक करना।
कार्यक्रम में इस बात पर भी जोर दिया गया कि समानता की शुरुआत घर से होती है। बच्चों को यदि घर में बिना भेदभाव अपनी बात रखने का अवसर मिलता है, उनके सवालों को गंभीरता से सुना जाता है और उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाता है, तो वे आगे चलकर अधिक संवेदनशील, जिम्मेदार और समानता में विश्वास रखने वाले नागरिक बन सकते हैं।
स्टैंड विद हर अभियान का उद्देश्य
स्टैंड विद हर अभियान वर्षभर चलने वाली पहल है, जिसका उद्देश्य लैंगिक समानता के विषय पर पुरुषों और महिलाओं के बीच खुले, ईमानदार और रचनात्मक संवाद के लिए मंच उपलब्ध कराना है। अभियान के तहत प्रत्येक माह अलग-अलग विषयों पर संवाद आयोजित किए जाते हैं, ताकि जागरूकता बढ़ाने के साथ सकारात्मक सामाजिक बदलाव को प्रोत्साहित किया जा सके।
पालन-पोषण विषय पर आयोजित छठे संवाद ने यह संदेश दिया कि समानता, सम्मान और सहमति की समझ बच्चों में अचानक वयस्क होने के बाद विकसित नहीं होती। इसकी नींव बचपन से ही परिवार के वातावरण, माता-पिता के व्यवहार और बच्चों के साथ होने वाले संवाद से तैयार होती है। बच्चों को सवाल पूछने, अपनी भावनाएं व्यक्त करने, दूसरों की सीमाओं का सम्मान करने और सही-गलत के बीच अंतर समझने का अवसर देकर ही अधिक समान, संवेदनशील और सम्मानजनक समाज का निर्माण किया जा सकता है।

