रक्षा की परिभाषा अब विस्तार चाहती है… — मोनिका चौहान
रक्षाबंधन की डोर बहुत छोटी होती है, लेकिन उसका भाव बहुत बड़ा। कलाई पर बंधी यह डोर वर्षों से हमें याद दिलाती आई है कि अपने किसी प्रिय के लिए खड़ा होना, उसकी चिंता करना और जरूरत के समय उसका साथ देना ही रक्षा का भाव है।
भाई द्वारा बहन की रक्षा का संकल्प इस पर्व की खूबसूरत पहचान रहा है। इसमें प्रेम है, विश्वास है और रिश्ते की जिम्मेदारी का भाव भी। लेकिन बदलते समय के साथ शायद रक्षा की परिभाषा को भी विस्तार देने का समय आ गया है।
रक्षा केवल उस क्षण शुरू नहीं होती, जब कोई खतरा सामने आ जाए। रक्षा उससे बहुत पहले शुरू होती है, उस परवरिश से जिसमें हम अपने बच्चों को दूसरे की गरिमा और सम्मान की कद्र करना सिखाते हैं।
भाई तो सदियों से बहन की रक्षा करता आया है। अब जरूरत है कि बहन भी बहन की, नारी भी नारी की और हर अच्छी सोच दूसरी अच्छी सोच की ताकत बने।
क्योंकि किसी बहन या बेटी की सुरक्षा केवल उस समय सुनिश्चित नहीं होती, जब कोई उसके सामने ढाल बनकर खड़ा हो। वह तब भी सुनिश्चित होती है, जब उसके आसपास के लोगों की सोच और संस्कार उसे असुरक्षित होने ही न दें।
जब किसी बच्ची के साथ दुष्कर्म की खबर आती है, तो कितनी ही माताएँ अपने मन को यह कहकर समझाती हैं, शुक्र है, वह मेरी बेटी नहीं थी।
लेकिन इस सोच को और आगे ले जाने की जरूरत है।
शुक्र है, वह अपराध करने वाला हमारा बेटा नहीं था… हमारा भाई नहीं था।
और इससे भी आगे, हमें ऐसी परवरिश करनी होगी कि किसी माँ को अपने बेटे के बारे में ऐसा डर ही न रहे।
बेटियों को सावधान करना जरूरी है, लेकिन क्या सारी जिम्मेदारी बेटियों की सावधानी पर डाल देना पर्याप्त है? उन्हें अपने आसपास के खतरे पहचानना सिखाना जरूरी है, लेकिन बेटों को यह समझाना भी उतना ही जरूरी है कि सामने वाले के सम्मान और गरिमा का ख्याल रखना क्या होता है।
क्योंकि किसी लड़की को सावधान रहने की सीख देना आसान है। एक लड़के के भीतर इतना विवेक पैदा करना कठिन है कि वह किसी लड़की की असहमति को असहमति ही समझे, अवसर नहीं।
यहीं रक्षा का अर्थ केवल सुरक्षा से आगे बढ़कर संस्कार बन जाता है।
और यह संस्कार केवल घर के भीतर तक सीमित नहीं रह सकता। जब किसी महिला के साथ गलत हो और दूसरी महिला उसे अकेला न छोड़े, यह भी रक्षा है। जब एक माँ अपनी बेटी के सपनों के सामने दीवार बनने के बजाय उसकी ताकत बने, यह भी रक्षा है। जब सास बहू को प्रतिद्वंद्वी नहीं, एक दूसरी स्त्री समझे और बहू भी सास के सम्मान को समझे, यह भी रक्षा है।
नारी का नारी की ताकत बनना केवल रिश्तों की नहीं, नारीत्व की गरिमा की भी रक्षा है।
यह कहना गलत होगा कि महिलाएँ एक-दूसरे का साथ नहीं देतीं। आज भी बहुत-सी महिलाएँ दूसरी महिलाओं के लिए रास्ते खोल रही हैं, मुश्किल समय में सहारा बन रही हैं और उनके अधिकारों के लिए आवाज़ उठा रही हैं। इन उदाहरणों की कमी नहीं, जरूरत इस भावना को सामान्य व्यवहार बनाने की है।
और बात केवल नारी तक क्यों रुके?
हर इंसान के लिए यही कसौटी होनी चाहिए। सामने वाला अपना है या पराया, स्त्री है या पुरुष, किस परिवार, जाति या पद से जुड़ा है, इससे पहले यह देखना जरूरी है कि सही क्या है और गलत क्या।
किसी अपने की गलती को केवल अपना होने के कारण सही ठहराना भी समाज को कमजोर करता है। सही के साथ खड़े होने का साहस और गलत को गलत कहने का विवेक भी समाज की रक्षा है।
शायद इस रक्षाबंधन पर हमें राखी बाँधते हुए केवल रक्षा का वादा ही नहीं, बल्कि एक बड़ा संकल्प भी लेना चाहिए।
हम ऐसी व्यवस्था, ऐसे संस्कार और ऐसा परिवेश बनाने में अपना हिस्सा निभाएँगे, जहाँ किसी की सुरक्षा किसी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी न रहे। और यह केवल आज की रक्षा नहीं है यह हमारे आने वाले कल की भी रक्षा है।
हम आज जिस सोच को अपने घरों में जगह देंगे, वही कल हमारे समाज का स्वभाव बनेगी। इसलिए राखी की यह डोर केवल रिश्ते को न बाँधे, हमारी जिम्मेदारी को भी बाँधे।
भाई बहन की ताकत बने। बहन भाई की। नारी नारी की। और हर अच्छी सोच दूसरी अच्छी सोच की।
क्योंकि रक्षा की सबसे सुंदर अवस्था शायद वह होगी, जब हमें हर बार किसी को बचाने के लिए दौड़ना न पड़े। जब हम ऐसा समाज बना सकें, जहाँ गलत सोच को पनपने की जगह ही कम होती जाए और हर आँगन में भाई की कलाई पर राखी बाँधती बहनें सुरक्षित, सहज और आत्मविश्वास से खिलखिलाती रहें।
यही शायद रक्षाबंधन की भावना का वह विस्तार है, जिसकी आज हमें सबसे अधिक जरूरत है।
आप सभी को प्रेम, विश्वास और रक्षा के इस पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।
शिक्षाविद्, सह-संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक – रेवांन्थम, करियर काउंसलर, पब्लिक स्पीकर, पर्सनालिटी एवं लाइफ स्किल डेवलपमेंट कोच

