महिला प्रदर्शन में कॉकरोच पार्टी के पुरुष कार्यकर्ताओं ने की धक्का-मुक्की
उदयपुर। महिला सुरक्षा को लेकर रविवार को उदयपुर में मार्च निकाला गया। सार्वजनिक कार्यक्रम में महिला अधिकारों के लिए जागरूक महिलाओं के तौर पर उदयपुर महिला अधिकार मंच की कार्यकर्ता भी शामिल हुईं।
मंच की कॉर्डिनेटर करिश्मा के नेतृत्व में शामिल हुई युवतियों ने टू जेंडर वन स्पिरिट, नीरजा भनोत एंड समित, मेवाड़ का स्वाभिमान- जौहर का सम्मान तथा सशक्त महिला के रूप में बादशाह की छाती पर पैर रखने वाली किरणा कुंवर का बीकानेर संग्रहालय वाला चित्र पोस्टर में दिखाया।
इस दौरान कॉकरोच पार्टी के चिराग खण्डेलवाल ने युवतियों से धक्का-मुक्की करते हुए पोस्टर छीन लिए और धक्का देकर अलग कर दिया। चिराग ने कहा कि यह मार्च हमारे द्वारा तय नियमों से होगा। इस दौरान पुलिस ने बीच-बचाव कर अलग किया।
उदयपुर महिला अधिकार मंच की सेक्रेटरी रीना ने कहा कि एक पुरुष द्वारा युवतियों के साथ की गई इस धक्का-मुक्की से सब हतप्रभ रह गए। सेक्रेटरी रीना ने महिला न्याय एवं अधिकार के संबंध में वक्तव्य जारी कर कहा कि गर्भवती महिलाओं की मृत्यु भी चिंता बनकर उभरी है। इसी क्रम में अपनी पहचान छिपाकर एक षड्यंत्र के तहत लड़कियों को लक्षित कर उन्हें भावनात्मक रूप से प्रेम प्रसंग में फंसाकर ग्रूमिंग गैंग के माध्यम से पंथ परिवर्तन करवाने पर भी कठोर कानून की आवश्यकता है। भारत की बेटियों का अपने मजहब की संख्या बढ़ाने के लिए उपयोग हो रहा है। 7-8 बच्चों तक के जन्म देने के लिए मजबूर किया जा रहा है। किसी भी मजहब की संख्या बढ़ाने के लिए महिला को टूल के रूप में उपयोग करना निंदनीय है।
दक्षिण राजस्थान में धन व रसूख के चलते नाता प्रथा का दुरुपयोग होने लगा है। रसूखदार लोग विवाह-विच्छेद कर अनेक विवाह कर रहे हैं। अभिनेता आमिर खान ऐसे लोगों के लिए नायक बनकर उभरे हैं।
बहु विवाह के अंतर्गत महिलाओं के स्वाभिमान से समझौते होते हैं, बल्कि उनके दोयम दर्जे का व्यवहार सहन करना पड़ता है। मजहब के भेद को त्यागकर सरकार को सभी महिलाओं के लिए समान अधिकार देने चाहिए। इसके लिए समान नागरिक संहिता जैसे प्रावधान आवश्यक हैं।
आधुनिकता व स्वच्छंद रिश्तों के नाम पर नई पीढ़ी की लड़कियों पर लिव-इन रिवाज थोपा जा रहा है। जिससे लड़कियों का शारीरिक शोषण हो रहा है। बल्कि इस रिश्ते से उत्पन्न शिशुओं से पुरुष जिम्मेदारी से भाग खड़े होते हैं। जिससे सारा भार महिला पर आ पड़ता है। जिससे उसका भविष्य एकल महिला के रूप में संघर्ष भरा हो जाता है। यदि महिला ऐसा न करे तो शिशु के हिस्से में अनाथालय आकर उसका जीवन दूभर हो जाता है। रिसर्च बताते हैं कि ऐसे रिश्तों से जन्मे बच्चे अधिक तनावपूर्ण जीवन बिताते हैं। जिससे अपराध व नशे की गिरफ्त में आने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए लिव-इन रिश्तों का पंजीकरण करना अनिवार्य होकर शिशु व महिला के प्रति पुरुष की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
महिलाओं के लिए संरक्षक की भूमिका में परिवार होना चाहिए। समान रूप से सम्मान, संरक्षण व अवसर दिए जाने चाहिए। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर बेटी के साथ भेदभाव होता है। इसके लिए जागरूकता के नाम पर सभी बेटियों को परिवार के विरुद्ध उकसाया जाए! पिता की सुरक्षा संबंधित चिंता को निगरानी के रूप में प्रस्तुत कर लड़कियों को भरमाया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है।
‘माय लाइफ माय चॉइस’ जैसी अवधारणा पश्चिम समाज से प्रेरित है। जबकि भारत में पूरा परिवार एक इकाई होकर सब एक-दूसरे के सुख-दुख के साथी होते हैं। परस्पर सहयोग करते हैं। योजनाबद्ध रूप से परिवार व्यवस्था के विरुद्ध उकसाकर पश्चिमी अवधारणा थोपी जा रही है। परिवार बेटियों के लिए संबल बने।

