क्या पापा भी बच्चे का ‘सेफ स्पेस’ हैं?
प्रिय अभिभावकगण,
कुछ समय पहले बच्चों के एक समूह से बातचीत के दौरान उनसे एक छोटा-सा सवाल पूछा गया।
अगर तुमसे कोई ऐसी गलती हो जाए, जिसे बताने में डर लगे, तो सबसे पहले किसे बताओगे?
ज़्यादातर बच्चों ने बिना सोचे जवाब दिया, मम्मी को।
फिर पूछा गया, और पापा?
कुछ बच्चों ने हँसते हुए कहा, पापा को बाद में बताएँगे और कुछ ने सहजता से जवाब दिया, पहले मम्मी को बताएँगे, फिर वो पापा को बता देंगी।
वहाँ मौजूद लोग मुस्कुरा दिए, लेकिन यह सवाल मेरे मन में देर तक ठहरा रहा।
क्या हमारे बच्चे अपने पिता से प्यार कम करते हैं? या उनके प्यार को महसूस करने का तरीका अलग होता है?
सच तो यह है कि शायद ही कोई पिता होगा, जो अपने बच्चे के लिए बेहतर भविष्य न चाहता हो। वह दिन-रात मेहनत करता है, अपनी इच्छाओं से पहले परिवार की जरूरतों को रखता है और कई बार अपनी थकान को भी मुस्कान के पीछे छिपा लेता है। उसका प्रेम अक्सर शब्दों में नहीं, जिम्मेदारियों में दिखाई देता है।
हर पिता अपने बच्चे का भविष्य सुरक्षित करना चाहता है, लेकिन बच्चे का बचपन भविष्य का इंतजार नहीं करता।
बच्चे भविष्य को नहीं जीते, वे आज को जीते हैं। इसलिए उन्हें यह भी महसूस होना चाहिए कि उनका भविष्य संवारने वाला इंसान, उनके आज में भी मौजूद है।
हम अक्सर सोचते हैं कि एक दिन बच्चे बड़े होकर हमारे त्याग को समझेंगे। शायद वे समझ भी जाएँ। लेकिन बचपन त्याग का हिसाब नहीं रखता, बचपन केवल यह महसूस करता है कि उसकी छोटी-सी दुनिया में उसके अपने कितने शामिल थे।
यहीं शायद पिता और बच्चे के बीच सबसे सुंदर समझ बनने की जरूरत है।
अधिकांश पिता अपने प्रेम को जिम्मेदारियों के रूप में जीते हैं, जबकि बच्चे प्रेम को साथ, संवाद और अपनापन के रूप में महसूस करते हैं।
जब प्रेम जताने और प्रेम महसूस करने का तरीका अलग-अलग हो जाता है, तब दूरी ही नहीं बनती, कई बार अनकही गलतफहमियाँ भी जन्म लेने लगती हैं।
हम अक्सर समय की कमी की बात करते हैं, लेकिन शायद बच्चों की यादों का गणित थोड़ा अलग होता है।
बच्चे यह नहीं गिनते कि पापा उनके साथ कितने घंटे रहे, वे यह याद रखते हैं कि जब पापा उनके साथ थे, तब उनका ध्यान कहाँ था।
शायद इसलिए बचपन की सबसे खूबसूरत यादें महँगे खिलौनों से नहीं बनतीं। वे बनती हैं उस शाम से, जब पापा ने बिना किसी जल्दबाज़ी के उनकी पूरी बात सुनी थी; उस छुट्टी से, जब दोनों ने साथ पतंग उड़ाई थी; या उस दिन से, जब किसी गलती पर डाँटने से पहले उनका हाथ थाम लिया था।
पिता अपने अनुभवों से बच्चों को जीवन की राह दिखाना चाहते हैं। यह स्वाभाविक भी है। लेकिन बच्चों की स्मृतियाँ थोड़ा अलग ढंग से काम करती हैं।
बच्चों को पिता की सलाह बाद में याद रहती है, पिता की प्रतिक्रिया पहले।
परीक्षा में कम अंक आए हों, कोई चीज़ टूट गई हो या उनसे कोई गलती हो गई हो, ऐसे क्षणों में पिता की पहली प्रतिक्रिया बच्चे के मन में यह तय करती है कि अगली बार वह सच तुरंत बताएगा या पहले कई बार सोचेगा।
और एक बात जो हम अक्सर भूल जाते हैं— बच्चे अपने पिता से डरते नहीं हैं, वे उन्हें निराश नहीं करना चाहते।
यही कारण है कि कई बार वे अपनी सबसे बड़ी उलझन भी देर से बताते हैं। डर की वजह से नहीं, बल्कि इस चिंता से कि कहीं उनके पिता का भरोसा उन पर कम न हो जाए।
यह लेख किसी भूमिका की तुलना करने के लिए नहीं है। माँ और पिता, दोनों का प्रेम अपने-अपने ढंग से अनमोल होता है। बस कभी-कभी उस प्रेम की भाषा को समझ लेना रिश्तों को और सहज बना देता है।
मनोविज्ञान भी बताता है कि जिन बच्चों को पिता का भावनात्मक साथ मिलता है, उनमें आत्मविश्वास, निर्णय क्षमता और भावनात्मक संतुलन बेहतर विकसित होता है। लेकिन भावनात्मक साथ का अर्थ हर समय साथ रहना नहीं है।
पिता का होना हमेशा बच्चे के पास बैठना नहीं होता, कई बार यह जानना ही काफी होता है कि चाहे परिस्थिति कैसी भी हो, पापा मेरे साथ खड़े होंगे।
रिश्ते एक दिन में नहीं बनते। वे छोटी-छोटी बातचीतों की किश्तों में बनते हैं।
हर बार जब बच्चा महसूस करता है कि आज भी मेरी बात पूरी सुनी गई, तब उसके भीतर भरोसे की एक और ईंट जुड़ जाती है।
हो सकता है, आपका काम आपको रोज़ देर तक व्यस्त रखता हो। हो सकता है आप महीनों घर से दूर रहकर परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाते हों। फिर भी जब भी आप अपने बच्चे के साथ हों, कोशिश कीजिए कि उन कुछ पलों में आपका ध्यान पूरी तरह उसी पर हो।
क्योंकि बच्चों को हमेशा ज़्यादा समय नहीं चाहिए होता, उन्हें ऐसे कुछ पल चाहिए होते हैं, जहाँ उन्हें यह महसूस हो कि उस समय दुनिया में सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण वही हैं।
अंत में एक विचार आपके साथ छोड़ जाना चाहूँगी —
हर परिवार की परिस्थितियाँ अलग होती हैं। कहीं बच्चा सबसे पहले माँ से बात करता है, कहीं पिता से और कहीं दादा-दादी से। यह तुलना का विषय नहीं है।
महत्वपूर्ण यह है कि जब बात पापा तक पहुँचे, तो बच्चे को यह भरोसा हो कि उसे केवल परखा नहीं जाएगा— समझा भी जाएगा।
शायद वर्षों बाद आपका बच्चा यह भूल जाए कि आपने उसके लिए कौन-सा खिलौना खरीदा था या कौन-सी साइकिल दिलाई थी। लेकिन वह यह कभी नहीं भूलेगा कि जब जीवन की किसी कठिन उलझन ने उसे घेरा था, तब उसके पिता उसके साथ थे।
शायद पिता होने की सबसे बड़ी सफलता यही नहीं कि बच्चे आपकी हर बात मानें, बल्कि यह है कि जीवन का सबसे कठिन सच भी वे आपके साथ बाँट सकें।
मोनिका चौहान
(शिक्षाविद्, सह-संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक – रेवांन्थम, करियर काउंसलर, पब्लिक स्पीकर, पर्सनालिटी एवं लाइफ स्किल डेवलपमेंट कोच)

