क्या हमारी पेरेंटिंग भी बच्चों के साथ बड़ी हो रही है?
बच्चों को केवल बड़ा करना पर्याप्त नहीं, उनके साथ स्वयं भी सीखना, बदलना और संवाद करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है
उदयपुर। बदलते समय के साथ बच्चों की सोच, प्रश्न पूछने का तरीका और दुनिया को देखने का नजरिया तेजी से बदल रहा है। ऐसे में यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या माता-पिता की सोच और पेरेंटिंग भी बच्चों के साथ बदल रही है? शिक्षाविद् एवं करियर काउंसलर मोनिका चौहान का मानना है कि आज बच्चों को केवल अनुशासन नहीं, बल्कि संवाद, विश्वास और समझ की सबसे अधिक आवश्यकता है।
वे कहती हैं कि पहले बच्चे वस्तुओं और घटनाओं के बारे में प्रश्न पूछते थे, जबकि आज वे निर्णयों, विचारों और जीवन मूल्यों पर सवाल करते हैं। यह परिवर्तन केवल बच्चों में नहीं आया है, बल्कि यह संकेत है कि अभिभावकों को भी अपनी परवरिश के तरीकों पर पुनर्विचार करना होगा।
मोनिका चौहान के अनुसार कई बार बच्चे इसलिए चुप नहीं होते कि उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं होता, बल्कि इसलिए क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी बात पूरी गंभीरता से नहीं सुनी जाएगी। यदि हर उत्तर से पहले उन्हें तुलना, आलोचना या उपदेश मिलता है, तो वे धीरे-धीरे अपने मन की बातें साझा करना बंद कर देते हैं।
वे बताती हैं कि आज की पीढ़ी जानकारी के अभाव में नहीं, बल्कि विकल्पों की अधिकता के बीच बड़ी हो रही है। इंटरनेट और सोशल मीडिया उन्हें अनेक उत्तर दे सकते हैं, लेकिन जीवन के भावनात्मक और नैतिक प्रश्नों का समाधान आज भी परिवार और माता-पिता के अनुभवों से ही मिलता है।
उनका मानना है कि अभिभावकों को केवल यह पूछने तक सीमित नहीं रहना चाहिए कि पढ़ाई कैसी चल रही है या परीक्षा में कितने अंक आए। उन्हें यह भी पूछना चाहिए कि बच्चे के मन में क्या चल रहा है, वह किन भावनाओं से गुजर रहा है और क्या कोई ऐसी बात है जिसे वह कहना चाहता है, लेकिन कह नहीं पा रहा।
लेख में यह भी उल्लेख किया गया है कि हर असहमति को अवज्ञा या बदतमीजी नहीं समझना चाहिए। कई बार बच्चों के प्रश्न केवल संवाद स्थापित करने का माध्यम होते हैं। जब माता-पिता अपनी गलतियां स्वीकार करते हैं, बच्चों की बात धैर्यपूर्वक सुनते हैं और उनके दृष्टिकोण को समझने का प्रयास करते हैं, तभी परिवार में विश्वास और आत्मीयता का वातावरण मजबूत होता है।
मोनिका चौहान का संदेश है कि बच्चों को बड़ा करना समय की प्रक्रिया है, लेकिन उनके साथ स्वयं भी सीखते और बदलते रहना एक सजग निर्णय है। अच्छी पेरेंटिंग वही है, जहां बच्चे केवल अच्छे नागरिक ही नहीं बनते, बल्कि अपने माता-पिता को भी बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देते हैं।

