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हमने अभद्र भाषा को सुनना कब स्वीकार कर लिया? | मोनिका चौहान

Reported By : Padmavat Media
Published : August 10, 2026 3:37 PM IST
विचार | सामाजिक सरोकार

हमने अभद्र भाषा को सुनना कब स्वीकार कर लिया?

शब्द केवल बोले नहीं जाते, वे धीरे-धीरे हमारी संस्कृति और सामान्य जीवन का हिस्सा बन जाते हैं
— मोनिका चौहान

घर में किसी बच्चे के मुंह से कोई गलत शब्द निकल जाए, तो हम तुरंत रोकते हैं। समझाते हैं कि ऐसे शब्द नहीं बोलते। हम चाहते हैं कि बच्चे गुस्से में भी भाषा की मर्यादा रखें। लेकिन वही बच्चा टीवी पर किसी नेता को दूसरे के लिए अपमानजनक शब्द बोलते सुन सकता है। सोशल मीडिया पर किसी बहस में तर्क से पहले व्यक्तिगत टिप्पणी दिखाई देती है। किसी फिल्म, वेब सीरीज या हास्य कार्यक्रम में भी कई बार अभद्र भाषा मनोरंजन का हिस्सा बन जाती है।

एक किशोर की मां होने के नाते यह विरोधाभास परेशान करता है। हम घर में बच्चों की भाषा पर इतनी सावधानी रखते हैं, लेकिन बाहर की दुनिया उन्हें कैसी भाषा सुना रही है? सवाल यही है कि हमने ऐसी भाषा को सुनना कब स्वीकार कर लिया?

संसद से लेकर टेलीविजन, सोशल मीडिया और मनोरंजन तक, अभद्र भाषा बार-बार सामने आ रही है। हाल ही में लोकसभा ने तृणमूल कांग्रेस सांसद कल्याण बनर्जी को दो महिला सांसदों के प्रति कथित अमर्यादित भाषा के मामले में मानसून सत्र के शेष समय के लिए निलंबित किया।

न्यायपालिका से जुड़े ‘कॉकरोच’ विवाद में मुख्य न्यायाधीश ने बाद में स्पष्ट किया कि टिप्पणी फर्जी डिग्रियों के सहारे पेशे में आए लोगों के संदर्भ में थी, पूरे युवा वर्ग के लिए नहीं। फिर भी वह शब्द सार्वजनिक विमर्श में फैल गया और व्यंग्य तथा विरोध का प्रतीक बन गया।

यही भाषा की चिंताजनक ताकत है। शब्द केवल बोले नहीं जाते, वे धीरे-धीरे हमारे सामान्य जीवन में घुलते चले जाते हैं।

अभद्र भाषा इतनी तेजी से फैलती क्यों है?

आज भाषा सिर्फ अभिव्यक्ति नहीं रही, वह लोगों का ध्यान खींचने का माध्यम भी बन गई है। जो बात चौंकाती है, काटती है, अपमानित करती है या विवाद पैदा करती है, वह जल्दी दिखाई देती है, जल्दी फैलती है और ज्यादा लोगों तक पहुंचती है।

कई बार अभद्र भाषा बोलने वाला व्यक्ति अपनी बात से ज्यादा अपनी भाषा के कारण चर्चा में आ जाता है। हम वीडियो देखते हैं, क्लिप साझा करते हैं, उस पर बहस करते हैं और अनजाने में उसी भाषा को और बड़ी पहुंच दे देते हैं।

हम केवल दर्शक नहीं हैं। हम उस भाषा को ताकत भी देते हैं।

मनोरंजन की दुनिया भी सवालों से अलग नहीं

मनोरंजन की दुनिया भी इससे अलग नहीं है। हाल के एक हास्य कार्यक्रम से जुड़े विवाद में आपत्तिजनक टिप्पणियों वाली क्लिप वायरल हुई, विरोध हुआ और बाद में माफी भी सामने आई। कई बार किसी कार्यक्रम की चर्चा उसकी प्रतिभा से ज्यादा उसकी भाषा के कारण होने लगती है। तब हमें यह भी देखना चाहिए कि हम किस चीज को अपना समय और ध्यान दे रहे हैं।

हर वायरल चीज को अपना ध्यान देना हमारी मजबूरी नहीं है।

नई भाषा नहीं, असभ्यता चिंता का विषय

नई पीढ़ी की अपनी शैली और शब्द हैं। भाषा का बदलना स्वाभाविक है। समस्या नई भाषा से नहीं है। समस्या तब शुरू होती है, जब असभ्यता को आत्मविश्वास, अपमान को बेबाकी और गाली को ‘कूल’ होने की निशानी समझ लिया जाए।

बच्चा दो-तीन साल में बोलना सीख जाता है। लेकिन क्या बोलना है, कब बोलना है और कितना बोलना है, यह सीखने में पूरी उम्र भी कम पड़ सकती है।

शब्दों का ज्ञान शिक्षा से आता है, लेकिन शब्दों का संयम संस्कार से आता है।

और यह संस्कार केवल घर में नहीं बनता। बच्चे यह भी देखते हैं कि किस भाषा से प्रभाव पैदा होता है, किस भाषा पर तालियां मिलती हैं और किस भाषा को सबसे ज्यादा अहमियत मिलती है।

सवाल सिर्फ नेताओं और कलाकारों का नहीं, हमारा भी है

सोशल मीडिया पर कोई अभद्र या आपत्तिजनक सामग्री सामने आए, तो उसे आगे बढ़ाने के बजाय रिपोर्ट करें। उसे लाइक और शेयर करके उसकी पहुंच न बढ़ाएं। एक व्यक्ति के ऐसा करने से शायद तुरंत कुछ न बदले, लेकिन अगर हम बार-बार ऐसी भाषा को अपनी पहुंच देने से इनकार करें, तो धीरे-धीरे इसका असर जरूर होगा।

जब हम अपना प्रतिनिधि चुनें, तो यह भी देखें कि असहमति के समय उसकी भाषा कैसी होती है। किसी विचार या नीति का विरोध करने के लिए व्यक्ति के चरित्र, परिवार या निजी जीवन को बहस में घसीटना जरूरी नहीं। जिस क्षण बहस में विचार पीछे और व्यक्ति आगे आ जाता है, संवाद अपनी गरिमा खोने लगता है।

भाषा हमारी संस्कृति की विरासत भी है

भाषा केवल शब्दों की धरोहर नहीं है। वह हमारी संस्कृति की विरासत भी है, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाती है। शायद इसलिए आज फिर कबीर को याद करने की जरूरत है:

“ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय।”

आज हमारी आवाज पहले से कहीं दूर तक जाती है। इसलिए शब्दों की जिम्मेदारी भी बड़ी हो गई है। सवाल यह है कि हम किस तरह की भाषा को अपने समय, अपने ध्यान और अपनी स्वीकृति से बड़ा बना रहे हैं?

क्योंकि शब्द हवा में खो नहीं जाते। वे धीरे-धीरे संस्कृति में घुलते हैं। और फिर एक दिन हमें पता चलता है कि जो भाषा कभी हमें चौंकाती थी, वही हमारे सामान्य जीवन का हिस्सा बन चुकी है।

हमारी भाषा कैसी होगी, यह केवल बोलने वाले तय नहीं करेंगे। सुनने वाले भी तय करेंगे।

— मोनिका चौहान
शिक्षाविद्, सह-संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक – रेवांन्थम,
करियर काउंसलर, पब्लिक स्पीकर, पर्सनालिटी एवं लाइफ स्किल डेवलपमेंट कोच

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6 comments

Anonymous 10/08/2026 at 4:13 PM

Very nice and verywell explained.

Reply
DrPoonam Hooda 10/08/2026 at 4:13 PM

Very nice and verywell explained.

Reply
सुधीर 10/08/2026 at 4:57 PM

आज की स्थिति में यह तर्क विचारणीय है।
इस सन्दर्भ को स्वाभाविक ढंग से पेश करना सराहनीय है।
आभार

Reply
Anonymous 10/08/2026 at 8:05 PM

बहुत ही प्रशंसनीय और सराहनीय लेख है।
शुभ कामनाएं

Reply
सुधीर 10/08/2026 at 8:06 PM

बहुत ही प्रशंसनीय और सराहनीय लेख है।
शुभ कामनाएं

Reply
Anonymous 11/08/2026 at 8:06 AM

Very well articulated and thought provoking article. Keep writing

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