आज़ादी के 79 साल बाद… क्यों न एक कर्तव्य दिवस भी मनाएँ?
— मोनिका चौहान
(शिक्षाविद्, सह-संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक – रेवांन्थम, करियर काउंसलर, पब्लिक स्पीकर, पर्सनालिटी एवं लाइफ स्किल डेवलपमेंट कोच)
कुछ तारीखें कैलेंडर पर सिर्फ़ तारीखें नहीं होतीं। वे याद दिलाती हैं कि हम कहाँ से आए हैं और अब हमें कहाँ जाना है।
15 अगस्त भी ऐसी ही एक तारीख है।
हर साल तिरंगा देखते हैं, राष्ट्रगान सुनते हैं, स्वतंत्रता सेनानियों की कहानियाँ याद करते हैं और उस संघर्ष को नमन करते हैं, जिसकी कीमत अनगिनत लोगों ने अपने बलिदान से चुकाई।
लेकिन इस बार एक सवाल मन में आता है।
हम स्वतंत्रता दिवस तो हर साल मनाते हैं… क्या हमें एक कर्तव्य दिवस भी नहीं मनाना चाहिए?
क्योंकि आज़ादी मिलना एक बात है और उसे सँजोकर आने वाली पीढ़ियों के लिए विरासत बना देना दूसरी।
हमारे बड़ों के पुण्य कर्मों, संघर्षों और बलिदानों से हमें आज़ादी मिली। अब उसे सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी किसकी है?
आपकी। मेरी। हम सबकी। और हर उस नागरिक की, जो इस देश को अपना कहता है।
शायद इसलिए एक दिन ऐसा भी होना चाहिए, जब हम तिरंगे के सामने केवल यह न सोचें कि देश ने हमें क्या दिया, बल्कि यह भी बता सकें कि हमने देश के लिए क्या किया।
क्या हमने अपना काम ईमानदारी से किया? क्या हमने किसी का हक़ नहीं मारा? क्या हमने नियमों को केवल दूसरों के लिए माना? क्या हमने आसपास की गंदगी देखकर सिर्फ़ शिकायत की, या उसे साफ़ करने की कोशिश भी की?
सवाल छोटे हैं, लेकिन शायद इतने गहरे कि देश के बड़े-बड़े जवाबों की नींव इन्हीं पर टिकी है।
कुछ लोग कहेंगे, जहाँ गरीबी, बेरोज़गारी और पिछड़ापन है, वहाँ इन बातों से क्या फर्क पड़ेगा?
गरीबी समस्या है। लेकिन क्या गरीबी हमारे मूल्यों को छोड़ देने का कारण भी बन जाए? क्या भ्रष्टाचार से गरीबी मिटेगी? क्या बेईमानी से विकास आएगा? क्या कानून तोड़कर हम मजबूत देश बना पाएँगे?
समस्याएँ वास्तविक हैं, लेकिन समाधान के नाम पर अपने मूल्यों से समझौता करना समाधान नहीं हो सकता।
आज़ादी एक जज़्बा थी। ईमानदारी भी एक जज़्बा हो सकती है। कर्तव्य भी। देश के लिए कुछ बेहतर करने की इच्छा भी।
और अगर व्यवस्था ठीक से काम नहीं कर रही, तो शिकायत करते रहना ही एकमात्र रास्ता क्यों हो?
खुद को इतना काबिल बनाइए कि कल वही व्यवस्था आपके हाथ में हो।
पुलिस ठीक से काम नहीं करती लगती है? पुलिस का हिस्सा बनिए। शिक्षा व्यवस्था में कमी दिखती है? शिक्षक बनिए। प्रशासन में सुधार चाहिए? उसका हिस्सा बनिए। राजनीति में अच्छे लोगों की कमी लगती है? दूर खड़े होकर शिकायत करने के बजाय आगे आने की हिम्मत कीजिए।
और फिर जिस जिम्मेदारी को चुनें, उसे निस्वार्थ होकर, निष्ठा से और बिना डरे निभाकर तो देखिए।
क्योंकि जब कोई व्यक्ति अपने हिस्से का काम ईमानदारी से करता है, तो वह केवल अपना कर्तव्य नहीं निभाता। वह लोगों के भीतर व्यवस्था, कानून और समाज के प्रति भरोसा भी जगाता है।
शायद इसी वजह से कभी-कभी किसी कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी को देखकर, किसी सैनिक को देखकर हमारा हाथ अनायास सलाम के लिए उठ जाता है।
हम केवल उसके पद या वर्दी को सम्मान नहीं देते। हम उस निष्ठा को सम्मान देते हैं, जिसमें व्यक्ति अपने स्वार्थ से ऊपर अपने कर्तव्य को रखता है।
देश भी आखिर ऐसे ही बनता है। अलग-अलग जगह खड़े लाखों लोग, अपने-अपने हिस्से का काम ईमानदारी से करते हुए।
एक शिक्षक अपने विद्यार्थी का भविष्य सँवारता है। एक डॉक्टर अपने मरीज के प्रति ईमानदार रहता है। एक अधिकारी नियम को सुविधा के हिसाब से नहीं मोड़ता। एक सामान्य नागरिक समझता है कि देश के लिए उसका छोटा-सा सही काम भी मायने रखता है।
काम अलग हैं, जिम्मेदारियाँ अलग हैं। लेकिन भावना एक हो सकती है:
“मेरे हिस्से का काम मैं ईमानदारी से करूँ।”
शायद यही भावना अगली पीढ़ी तक पहुँचानी है।
उन्हें सिर्फ़ यह नहीं बताना कि हमारे बड़ों ने देश को आज़ाद कराया था। यह भी बताना है कि उस आज़ादी को सँजोकर रखना हमारा कर्तव्य है।
आने वाली पीढ़ियाँ भी 15 अगस्त को तिरंगा फहराएँ और गर्व से कह सकें कि हम आज़ाद देश में रहते हैं, इसके लिए केवल अपने अतीत पर गर्व करना काफी नहीं है। हमें यह भी तय करना होगा कि आज हम अपने कर्मों से अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए कैसा देश छोड़ रहे हैं।
क्योंकि आज़ादी कोई ऐसी विरासत नहीं, जिसे एक बार पाकर हमेशा के लिए सुरक्षित मान लिया जाए। हर पीढ़ी उसे अपने कर्मों से मजबूत करती है… या धीरे-धीरे कमजोर भी कर सकती है।
तो क्यों न इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस के साथ एक कर्तव्य दिवस भी मनाएँ?
बस एक दिन अपने अधिकारों से थोड़ा आगे जाकर अपने कर्तव्यों की ओर देखें। देश से सवाल करने से पहले खुद से एक सवाल करें:
“मैं अपने देश के लिए क्या कर रहा हूँ?”
मेरा काम, मेरा व्यवहार, मेरी ईमानदारी, मेरी जिम्मेदारी,मेरी भागीदारी।
क्योंकि देश केवल वह नहीं है, जिसे हम 15 अगस्त को झंडे में देखते हैं। देश वह भी है, जो हम 16 अगस्त से अगले 364 दिनों तक अपने कर्मों में बनाते हैं।
आज़ादी हमें मिली है… अब उसे गरिमा के साथ आगे ले जाना हमारा कर्तव्य है।
स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
(शिक्षाविद्, सह-संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक – रेवांन्थम, करियर काउंसलर, पब्लिक स्पीकर, पर्सनालिटी एवं लाइफ स्किल डेवलपमेंट कोच)


4 comments
Really appreciate your view on this… 👏👏👏👏
Nicely explained
Meaningful thought and nicely expressed. Well done..
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