तिरंगा मेरी जान, मेरी शान, मेरे देश की पहचान – ऋतु सोढ़ी
जब मैं इसे अपने हाथों में थामती हूँ, तो मेरे मन में दो नाम गूंजते हैं—मेरे नाना हंसराज सोढ़ी और मेरे मामा लाला हरबंस। ये नाम इतिहास की किताबों में बड़े-बड़े अध्यायों में नहीं लिखे गए होंगे, पर हमारे परिवार की स्मृतियों में ये अमर हैं। उन्होंने उस काल में तिरंगे को केवल फहराने का नहीं, बल्कि जीने और मरने का माध्यम बनाया था।
अंग्रेजी हुकूमत के अंधेरे दिनों में जब देश की आजादी का दीपक बुझने को था, तब ऐसे ही अनगिनत परिवारों ने अपने घरों को क्रांति की प्रयोगशाला बना दिया था। नाना जी और मामा जी की उस चुपचाप सेवा, उस निर्भीक संकल्प ने हमें यह विरासत दी कि तिरंगा केवल झंडा नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है।
मामाजी ने काला पानी की सजा काटी। मेरे नानाजी ने इतना बलिदान देने के बाद भी न कोई पद ग्रहण किया और न कोई सुविधा ली। क्योंकि उनकी नजर में यह एक निःस्वार्थ सेवा थी।
जब मैं बड़ी हुई और इतिहास को पढ़ना शुरू किया तो मैंने पाया कि यह जिम्मेदारी केवल हमारे परिवार तक सीमित नहीं थी। देश के एक-एक प्रांत ने बलिदान दिए, तब जाकर आज हम खुली हवा में सांस ले सकते हैं।
राजस्थान की माटी में बसी क्रांति की गाथा
राजस्थान की माटी भी उतनी ही वीर और बलिदानी है। यहां की रेत में क्रांतिकारियों के खून की महक आज भी महसूस होती है। शाहपुरा के बारहठ परिवार—केसरी सिंह, प्रताप सिंह और जोरावर सिंह बारहठ—ने जिस तरह अंग्रेजों की नींव हिलाई, जैसलमेर के सागरमल गोपा ने जिस तरह जेल की कालकोठरी में भी आजादी का गीत गाया, बीजोलिया के किसानों ने जिस तरह रियासती शोषण के खिलाफ विद्रोह किया और 1857 से लेकर 1942 तक अनगिनत अज्ञात वीरों ने जिस तरह अपनी जान न्योछावर की—ये सब तिरंगे के सच्चे पुजारी थे।
राजस्थान की इस तपती धरती ने कभी सर झुकने नहीं दिया। रियासतों के अंदर भी क्रांति की चिंगारियां जलती रहीं और अंततः स्वतंत्र भारत के मानचित्र पर राजस्थान का उदय हुआ।
विरासत से जिम्मेदारी तक
आज जब मैं राजस्थान सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग में सहायक निदेशक के रूप में कार्य करती हूं, तो हर सरकारी संदेश, हर जन-जागरण अभियान और हर प्रेस विज्ञप्ति के पीछे मुझे वही तिरंगा दिखाई देता है, जिसे मेरे नाना हंसराज सोढ़ी और मामा लाला हरबंस ने अपने जीवन से सींचा था। और साथ ही राजस्थान की उस माटी की गंध भी महसूस होती है, जिसने अनगिनत क्रांतिकारियों को जन्म दिया।
केसरिया हमें याद दिलाता है कि त्याग बिना कोई स्वतंत्रता अधूरी है।
सफेद हमें सिखाता है कि सत्य ही सबसे बड़ी शक्ति है।
हरा हमें आगे बढ़ने का संकल्प देता है।
और अशोक चक्र… वह कभी न रुकने वाला पहिया, जो हमें निरंतर गतिशील रखता है।
तिरंगे के नाम एक प्रार्थना
तिरंगे को थामते हुए मेरी एक ही प्रार्थना है—
हे तिरंगे! मेरे नाना और मामा जैसे अनगिनत वीरों के बलिदान को व्यर्थ न होने देना।
राजस्थान की इस वीर भूमि की क्रांति की ज्वाला को सदा प्रज्वलित रखना।
और हमें इतना सशक्त बनाना कि हम तुझे केवल झंडे के रूप में नहीं, बल्कि अपने आचरण, अपनी सेवा और अपने संकल्प में जी सकें।

