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भक्तामर विधान में मुनिश्री अजीत सागर जी का संदेश: आराधना से ही आत्मकल्याण का मार्ग

Reported By : Padmavat Media
Published : January 1, 2026 12:21 AM IST

भक्तामर विधान में मुनिश्री अजीत सागर जी का संदेश: आराधना से ही आत्मकल्याण का मार्ग

मुंबई । भक्तामर विधान के पावन अवसर पर मुनिश्री अजीत सागर जी ने कहा कि जीवन के प्रत्येक क्षण को प्रभु आराधना में समर्पित कर ही आत्मस्वरूप की प्राप्ति संभव है। उन्होंने बताया कि केवल साधनों से नहीं, बल्कि गुरु वाक्यों में अटूट श्रद्धा, भक्ति और संयम के माध्यम से ही दुःखों पर विजय पाई जा सकती है। बदलते वर्ष के साथ आदतों और प्रवृत्तियों में सकारात्मक परिवर्तन कर, खानपान में संयम लाकर मानव जीवन के हर क्षण को आराधना से जोड़ने का आह्वान किया।

इस अवसर पर ऐलक श्री विवेकानंद सागर जी ने कहा कि सुख में समर्पण और दुःख में शरण का भाव अपनाकर जीवन को श्रेष्ठ बनाया जा सकता है। उन्होंने पाश्चात्य संस्कृति से दूर रहकर आर्य संस्कृति अपनाने, बच्चों को भारतीय संस्कारों से जोड़ने तथा परिवार सहित धर्म से जुड़ने पर जोर दिया।

भक्तामर विधान में सोधर्म इंद्र के रूप में श्रीमान महेश–रुचि अग्रवाल, कुबेर इंद्र के रूप में श्रीमान जितेंद्र–रेखा बड़जात्या तथा ईशान इंद्र के रूप में पदम–शशि सोनी ने प्रमुख पात्र बनकर विधान का लाभ लिया। इसके साथ ही लगभग 150 श्रद्धालुओं ने सामान्य इंद्र बनकर सहभागिता की।

नूतन वर्ष के उपलक्ष में प्रातः 7 बजे श्री शांतिनाथ भगवान की आराधना होगी। मुनिश्री अजीत सागर जी, मुनिश्री निराग सागर जी एवं ऐलक श्री विवेकानंद सागर जी के सानिध्य में धर्मदेशना का लाभ लेकर जीवन को सुख, शांति और सदाचार की दिशा में आगे बढ़ाने का संदेश दिया गया।

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