राष्ट्र का चरित्र कौन गढ़ता है?
– मोनिका चौहान
(शिक्षाविद्, सह-संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक – रेवांन्थम, करियर काउंसलर, पब्लिक स्पीकर, पर्सनालिटी एवं लाइफ स्किल डेवलपमेंट कोच)
हाल के दिनों में हमने कई ऐसी घटनाएँ देखीं, जिन्होंने लोगों को अलग-अलग पक्षों में खड़ा कर दिया। सोशल मीडिया पर राय पहले बनती दिखाई दी, तथ्य बाद में आए। किसी ने एक वीडियो देखकर निर्णय लिया, किसी ने एक पोस्ट पढ़कर। ऐसा लगा जैसे सच तक पहुँचने की इच्छा से ज़्यादा, किसी निष्कर्ष तक पहुँचने की जल्दी हो।
ऐसे समय में एक सवाल मन में उठता है- क्या हमारे सामने सबसे बड़ा संकट विचारों का है… या नागरिकता का?
हम अक्सर किसी राष्ट्र की ताकत उसकी सेना, अर्थव्यवस्था, तकनीक या संविधान में खोजते हैं। निस्संदेह ये किसी भी देश के मजबूत स्तंभ हैं। लेकिन एक और स्तंभ है, जिसके बिना इनमें से कोई भी लंबे समय तक मजबूत नहीं रह सकता।
देश केवल सीमाओं से नहीं बनता… नागरिकों के स्वभाव से भी बनता है।
युद्ध के समय सैनिक सीमा की रक्षा करता है, लेकिन शांति के समय देश अपने नागरिकों के चरित्र पर खड़ा होता है। नागरिकता केवल मतदान के दिन दिखाई देने वाली चीज़ नहीं है। वह हमारे रोज़मर्रा के व्यवहार में दिखाई देती है।
एक देश तब भी मजबूत होता है, जब लोग ट्रैफिक सिग्नल पर कोई पुलिसकर्मी न होने पर भी रुकते हैं। जब कोई व्यक्ति सड़क पर पड़ा कचरा यह सोचकर नहीं छोड़ता कि “एक मेरे करने से क्या होगा।” जब लोग बिना पुष्टि किए अफवाहें आगे नहीं बढ़ाते। जब मतभेद होने पर भी संवाद बचा रहता है। जब अधिकारों के साथ कर्तव्यों की भी बात होती है।
लेकिन ऐसे नागरिक बनते कैसे हैं?
भीड़ का हिस्सा बनना आसान है। नागरिक बनना कठिन है। भीड़ भावनाओं से चलती है, नागरिक समझ से। भीड़ नारे दोहराती है, नागरिक प्रश्न पूछता है। भीड़ पक्ष चुन लेती है, नागरिक पहले समझने की कोशिश करता है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत भीड़ नहीं होती… स्वतंत्र सोच रखने वाले नागरिक होते हैं।
इसलिए नागरिकता की सबसे बड़ी परीक्षा चुनाव के दिन नहीं होती, उसकी सबसे बड़ी परीक्षा उस दिन होती है, जब हमारे सामने कोई ऐसा व्यक्ति खड़ा हो, जिससे हम पूरी तरह असहमत हों। उसी क्षण तय होता है कि हम केवल मतदाता हैं या सचमुच नागरिक।
सहमत होना हमारा अधिकार है। असहमत होना भी उतना ही बड़ा अधिकार है।
लेकिन लोकतंत्र की परिपक्वता इस बात से नहीं मापी जाती कि वहाँ कितने लोग एक-दूसरे से सहमत हैं। उसकी परिपक्वता इस बात से मापी जाती है कि असहमति के बावजूद लोग एक-दूसरे का सम्मान कितना बचाए रखते हैं।
क्या हमने असहमति का उत्तर अपमान से दिया या तर्क से? क्या हमने विरोध को शत्रुता बना दिया या संवाद का अवसर? क्या हमने हर सुनी हुई बात पर विश्वास कर लिया या सच तक पहुँचने का धैर्य रखा?
डिग्री हमें शिक्षित बना सकती है, लेकिन व्यवहार ही बताता है कि शिक्षा भीतर तक पहुँची या नहीं।
यहीं से माता-पिता और शिक्षकों की भूमिका शुरू होती है। क्योंकि ऐसे नागरिक संसद में नहीं बनते, वे सबसे पहले घरों और विद्यालयों में तैयार होते हैं।
हम बच्चों को सच बोलना सिखाते हैं, लेकिन क्या हम उन्हें सच खोजना भी सिखाते हैं? हम उन्हें अपनी बात कहना सिखाते हैं, पर क्या हम उन्हें दूसरी बात सुनना भी सिखाते हैं?
बच्चा लोकतंत्र संविधान से नहीं सीखता… वह यह देखकर सीखता है कि घर में उसकी असहमति का सम्मान होता है या नहीं।
जिस बच्चे को सवाल पूछने की अनुमति नहीं मिलती, उससे बड़े होकर स्वतंत्र नागरिक बनने की उम्मीद करना कठिन है। और जिस घर में हर मतभेद को अनुशासनहीनता समझ लिया जाता है, वहाँ संवाद नहीं, केवल आज्ञापालन पैदा होता है।
हर युग में लोगों को गुमराह करने वाले रहे हैं। फर्क केवल इतना है कि पहले उन्हें भीड़ तक पहुँचने में साल लग जाते थे, आज कुछ मिनट। एक अधूरी जानकारी, एक भावनात्मक वीडियो या एक वायरल संदेश लाखों लोगों की सोच को प्रभावित कर सकता है।
आज सूचना की कमी नहीं है, कमी है ठहरकर सोचने की।
इसलिए आज के समय में सबसे बड़ी नागरिक जिम्मेदारी केवल राय रखना नहीं, बल्कि राय बनाने से पहले रुकना है। तथ्य देखना, संदर्भ समझना और यह पूछना कि कहीं हमारी भावनाएँ किसी और के उद्देश्य का साधन तो नहीं बन रही हैं।
हम अपने बच्चों को क्या विरासत देना चाहते हैं? एक घर, एक डिग्री और एक अच्छी नौकरी… या ऐसी सोच, जो भीड़ के बीच खड़े होकर भी अपना निर्णय स्वयं ले सके? उनके विचार लचीले हों… लेकिन उनके सिद्धांत अडिग हों। वे नए विचार सुनें, उनसे सीखें, ज़रूरत पड़े तो अपनी राय भी बदलें, लेकिन ईमानदारी, सम्मान और सत्यनिष्ठा जैसे मूल्यों पर कभी समझौता न करें।
क्योंकि शायद आने वाले वर्षों में हमारे बच्चे यह याद न रखें कि किसी मुद्दे पर हमारी राय क्या थी। लेकिन वे यह ज़रूर याद रखेंगे कि मतभेद के समय हमारा व्यवहार कैसा था।
बच्चे हमारी राय के उत्तराधिकारी नहीं बनते… वे हमारे व्यवहार के उत्तराधिकारी बनते हैं।
आख़िरकार लोकतंत्र केवल संसद में नहीं चलता। वह हमारे घरों में चलता है, विद्यालयों में चलता है, सड़कों पर चलता है और हर उस जगह चलता है, जहाँ दो लोग असहमत होते हुए भी एक-दूसरे का सम्मान करना चुनते हैं।
सीमाएँ सैनिक सुरक्षित रखते हैं… लेकिन राष्ट्र का चरित्र उसके नागरिक सुरक्षित रखते हैं।
और अच्छे नागरिक पैदा नहीं होते, तैयार किए जाते हैं।
घरों में। विद्यालयों में। और सबसे पहले… हमारे अपने व्यवहार से।

