आठवीं पुण्यतिथि पर विशेष: नन्ही क्रांतिकारी ज्योति सिंह, जिसने शिक्षा और देशभक्ति की मशाल जलाई
पाली/देसूरी। हजारों मंज़िलें होंगी, हजारों कारवां होंगे, ज़माना हमको ढूंढेगा, न जाने हम कहां होंगे…, इन पंक्तियों को जीने वाली नन्ही बाल समाजसेविका ज्योति सिंह का जीवन भले ही अल्पकालिक रहा, पर उनके कार्य और विचार आज भी लोगों के हृदय में अमर हैं। गुरुवार को उनकी आठवीं पुण्यतिथि पर क्षेत्रभर में उन्हें श्रद्धापूर्वक याद किया गया।
शहीद भगतसिंह के विचारों से प्रेरित क्रांतिकारी कर्मपाल सिंह सवाली ने वर्ष 2005 में राजस्थान क्रांति मोर्चा के नेतृत्व में आदिवासी बच्चों में शिक्षा और देशभक्ति की अलख जगाने का अभियान शुरू किया। इस मिशन में मीठीबोर (उदयपुर) जैसे दूरस्थ गांवों में देशभक्ति कार्यक्रम, झांकियां और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां आयोजित होतीं, जिनमें उनकी पुत्री ज्योति सिंह का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा।
28 अक्टूबर 2003 को शिवगंज (सिरोही) में जन्मी ज्योति बचपन से ही क्रांतिकारी सोच और राष्ट्रसेवा की भावना से ओतप्रोत थीं। पांचवीं कक्षा की छात्रा रहते हुए ही वे हर रविवार अपने पिता के साथ आदिवासी बच्चों के बीच जातीं और उन्हें शिक्षा के महत्व के साथ-साथ देशभक्ति का संदेश देतीं। उनकी नन्ही उम्र के बावजूद, उनका जज़्बा और समर्पण बड़े-बड़ों के लिए प्रेरणास्रोत था। उनका लक्ष्य केवल स्वयं को शिक्षित करना नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र के बच्चों को भी ज्ञान और संस्कारों से सशक्त बनाना था।
15 अगस्त 2017, स्वतंत्रता दिवस के दिन, जब पूरा देश आजादी का पर्व मना रहा था, तभी ज्योति ने संसार को सदा के लिए अलविदा कह दिया। उनकी विदाई ने परिवार, मित्रों और समाज को गहरे शोक में डाल दिया।
आठवीं पुण्यतिथि पर राजस्थान क्रांति मोर्चा के कार्यकर्ता, केसरी ग्रुप देसूरी के सदस्य और अनेक मित्रों ने श्रद्धांजलि अर्पित की। सभी ने कहा ज्योति सिंह द्वारा किए गए महान कार्यों को कभी भुलाया नहीं जा सकता। वे सदैव हमारे दिलों में जीवित रहेंगी और नई पीढ़ी को प्रेरित करती रहेंगी।
ज्योति का जीवन इस संदेश के साथ आज भी जिंदा है कि उम्र चाहे कितनी भी हो, यदि दिल में देश और समाज के लिए कुछ करने की चाह हो, तो छोटी सी उम्र भी बड़े बदलाव ला सकती है।

